हम जब भी जावेद अख्तर का नाम सुनते हैं, तो दिमाग में सबसे पहले दमदार संवाद, गहरे अर्थ वाले गीत और बेबाक विचार आते हैं। जावेद अख्तर आज 81 साल के हो गए हैं, लेकिन उनकी सोच आज भी उतनी ही जवान है, जितनी कभी ‘शोले’ और ‘दीवार’ के वक्त थी।
वे उन चंद लोगों में हैं, जो खुले मंच से कहने का साहस रखते हैं कि “हिंदी सिर्फ हिंदुओं की भाषा नहीं है और उर्दू सिर्फ मुसलमानों की नहीं।” यह वाक्य सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि उस इंसान की पूरी सोच को दिखाता है, जिसने धर्म, जाति और पहचान से ऊपर इंसान को रखा।
गरीबी, संघर्ष और सपनों से भरी शुरुआत
जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को हुआ। वे मशहूर उर्दू शायर जान निसार अख्तर के बेटे हैं। घर में साहित्य था, शायरी थी, लेकिन स्थिरता नहीं थी। बचपन से ही उन्होंने उतार-चढ़ाव देखे। 19 साल की उम्र में एक सपना लेकर वे मुंबई पहुंचे गुरु दत्त के साथ काम करने का सपना। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। मुंबई पहुंचने के एक हफ्ते के भीतर गुरु दत्त का निधन हो गया। सपना टूट गया, लेकिन हौसला नहीं। मुंबई में ऐसे दिन भी आए जब जावेद अख्तर के पास सोने के लिए जगह नहीं थी। कभी पार्क में रात बिताई, कभी दोस्तों के घर। खाने के लिए पैसे नहीं थे, लेकिन लिखने का जुनून था।
कमल अमरोही से लेकर सलीम-जावेद तक
संघर्ष के दौर में जावेद अख्तर को फिल्मकार कमल अमरोही के साथ काम करने का मौका मिला। यहीं से फिल्मों की दुनिया में उनकी असली एंट्री हुई। बाद में उनकी मुलाकात सलीम खान से हुई और यहीं से बना भारतीय सिनेमा का सबसे ऐतिहासिक लेखक जोड़ी सलीम-जावेद। इस जोड़ी ने वो किया, जो आज भी कोई दोहरा नहीं सका। इन्होंने हीरो को सिर्फ रोमांटिक नहीं, बल्कि सिस्टम से लड़ने वाला आम आदमी बनाया।
नास्तिक कैसे बने जावेद अख्तर
जावेद अख्तर ने कई बार खुलकर कहा है कि वे नास्तिक हैं। लेकिन यह नास्तिकता नफरत से नहीं, सवाल पूछने से आई। उनका मानना है कि जब उन्होंने धर्म के जवाबों से ज़्यादा सवाल पाए, तब उन्होंने खुद सोचना शुरू किया। वे कहते हैं कि धर्म निजी आस्था हो सकती है, लेकिन समाज को चलाने का आधार नहीं।
उनकी यह सोच कई बार विवादों में भी आई, लेकिन उन्होंने कभी अपने विचार नहीं बदले।
सिंपल और रेगुलर लाइफ में विश्वास रखते हैं जावेद अख़्तर
जावेद अख़्तर ने कहा कि वे किसी खास नियम या सख्त लाइफस्टाइल को फॉलो नहीं करते। उनकी ज़िंदगी बिल्कुल साधारण और स्वाभाविक है, जिसमें कोई बनावटीपन नहीं है। उन्होंने बताया कि कभी वे देर रात तक जागते हैं तो कभी जल्दी सो जाते हैं, तो कभी देर से उठते हैं। उनके मुताबिक ज़िंदगी को घड़ी से नहीं, सहजता से जीना ज़्यादा ज़रूरी है। जावेद अख़्तर ने कहा कि वे खानपान को लेकर भी बहुत सख्त नहीं हैं। कभी कुछ उल्टा-पुल्टा खा लेते हैं, कभी बिल्कुल हल्का खाते हैं। यहां तक कि वे शक्कर वाली चाय भी पीते हैं।
भाषा पर उनकी सबसे बड़ी लड़ाई
जावेद अख्तर बार-बार कहते हैं कि भाषा को धर्म से जोड़ना सबसे बड़ी भूल है। उनके मुताबिक हिंदी भारत की साझी भाषा है, उर्दू भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब की पहचान है, वे मानते हैं कि उर्दू को मुसलमानों की और हिंदी को हिंदुओं की भाषा कहना समाज को तोड़ने जैसा है।





