स्मृति शेष: ग्वालियर से ही शुरू हुई थी जोगी की प्रशासनिक यात्रा, “अनुशासित और कड़क थे जोगी”

स्मृति शेष: ग्वालियर से ही शुरू हुई थी जोगी की प्रशासनिक यात्रा, “अनुशासित और कड़क थे जोगी”

ग्वालियर। अतुल सक्सेना| इंजीनियर, टीचर, प्रशासनिक अधिकारी और राजनेता। व्यक्ति अपने जीवन में इनमें से कोई एक सपना ही पूरा कर पाता है लेकिन अजीत जोगी (Ajit Jogi) एक ऐसा नाम है जिसने ना सिर्फ ये सब सपने देखे बल्कि इन्हें अपने हिसाब से ही जीया भी। आज उनके निधन से छत्तीसगढ़ (Chattisgarh) ही नहीं मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) को भी नुकसान हुआ है। अजीत जोगी का ग्वालियर (Gwalior) से भी कुछ समय का रिश्ता रहा है। उन्होंने अपनी प्रशासकीय सेवा की शुरुआत ग्वालियर से ही की थी।

मौलाना आजाद कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी भोपाल से 1968 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री गोल्ड मेडल से साथ पास करने वाले अजीत जोगी मेधावी छात्र थे। एक गरीब अनुसूचित जाति परिवार में जन्मे अजित ने कभी गरीबी को अपने करियर में बाधा नहीं बनने दिया। इंजीनियर बनने के बाद उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी रायपुर में बतौर टीचर नौकरी की। इसी दौरान अजित जोगी ने यूपीएससी की परीक्षा पास की और उनका चयन आईपीएस एवं आईएएस के लिए हो गया। अजित ने भारतीय पुलिस सेवा की जगह भारतीय प्रशासनिक सेवा को चुना।

ग्वालियर में बतौर प्रशिक्षु आईएएस की प्रशासनिक यात्रा की शुरुआत
मप्र कैडर के आईएएस अजीत जोगी को बतौर प्रशिक्षु आईएएस सबसे पहली पोस्टिंग ग्वालियर में मिली। 1972-73 में वे यहाँ अपर कलेक्टर रहे। इस दौरान शहर के विकास से जुड़े कई मुद्दों पर उनकी राय महत्वपूर्ण मानी जाती थी। उस समय के छात्र नेता और वरिष्ठ पत्रकार डॉ केशव पांडे अजित जोगी को याद करते हुए कहते हैं कि वे बहुत ही अनुशासित और कड़क अफसर थे। उनकी प्रशासनिक पकड़ और समझदारी के कायल तत्कालीन कलेक्टर राम किशन गुप्ता भी थे। डॉ पांडे बताते हैं कि उस समय के प्रशासनिक अधिकारियों में अजित जोगी एक्सलेंट अफसर माने जाते थे, निर्णय लेने में वे बहुत तेज थे। ग्वालियर में प्रशिक्षण पूरा करने के बाद वे बैतूल, शहडोल, रायपुर और फिर इंदौर के कलेक्टर बने और करीब 14 साल तक मध्यप्रदेश में बतौर कलेक्टर काम किया।

इंदिरा गांधी के शब्दों और राजीव गांधी के प्रयासों से बने राजनेता
अजीत जोगी के बारे में बताया जाता है कि जब वो प्रशिक्षु आईएएस अधिकारी थे तब उनकी मुलाकात पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से हुई थी। अजित जोगी की कार्य कुशलता देखकर इंदिरा प्रभावित हुई। इस दौरान एक चर्चा के बीच इंदिरा गांधी ने अजित जोगी से कहा कि इस देश असली ताकत डीएम, सीएम और पीएम के हाथ में होती है। इंदिरा के कहे ये शब्द अजित के मन में घर कर गए। लेकिन कलेक्टर रहते हुए बात आई गई हो गई। बाद में राजीव गांधी से मुलाकात के दौरान जब इस बात का जिक्र हुआ तो राजीव ने अजित के मन की गहरी बात को बाहर निकाल लिया और राजनीति में ले आये।

पीएमओ से आये फोन कॉल ने ढाई घंटे में बदल दी जिंदगी 
मध्यप्रदेश में 14 साल तक कलेक्टर रहने वाले अजीत होगी जब इंदौर कलेक्टर थे तब राजीव गांधी का कई बार इंदौर आना जान हुआ। जब राजीव आते तो अजित उन्हें रिसीव करने जाते। दोनों युवा थे तो दोस्त जैसी बातें होने लगी। जब इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और उसके बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तब अजित जोगी इंदौर कलेक्टर थे। उनके नाम इंदौर में सबसे लंबे समय तक कलेक्टर रहने का रिकॉर्ड बन गया था। जून 1986 में अजीत जोगी की पदोन्नति के आदेश हो चुके थे । उनकी कार्यशैली से प्रभावित इंदौर के लोग उन्हें विदाई देने में व्यस्त थे। उसी समय पीएम कार्यालय से उनके घर फोन आया। जोगी घर पर नहीं थे पत्नी रेणु जोगी ने बताया कि पीएमओ से फोन आया था तो अजित जोगी को विश्वास नहीं हुआ कि भला एक कलेक्टर के पास पीएमओ से फोन क्यों आयेगा। सुबह फिर फोन आया राजीव गांधी के पीए ने फोन पर कहा कि पीएम चाहते हैं कि आप तत्काल कलेक्टर पद से इस्तीफा दे दें । अजित घबराये लेकिन अगले ही पल पीएम ने कहा कि सर चाहते हैं कि आप मप्र से राज्यसभा का नामांकन भरें। पीए ने कहा कि दिग्विजय सिंह आपको लेने रात 12 बजे पहुंचेंगे। सुबह 11 बजे तक इस्तीफे के सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएं। उसके बाद कलेक्टर पद से इस्तीफा देने और कांग्रेस की सदस्यता लेने में ढाई घण्टे का समय लगा और अजीत जोगी प्रशासनिक अफसर से राजनेता बन गए।

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निदेशक और संपादक

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