हरियाणा विधानसभा में नौ महीने से रिक्त है नेता प्रतिपक्ष का पद, कांग्रेस की खींचतान जारी

विपक्ष की गैर-मौजूदगी से विधानसभा की कार्यवाही एकपक्षीय होती जा रही है, जो लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।
हरियाणा कांग्रेस

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हरियाणा की राजनीति एक असामान्य दौर से गुजर रही है। राज्य में 15वीं विधानसभा के गठन को नौ महीने पूरे हो चुके हैं, लेकिन अब तक विपक्ष का नेता (नेता प्रतिपक्ष) नियुक्त नहीं किया गया है। यह स्थिति प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में पहली बार देखने को मिल रही है जब विधानसभा में किसी एक विपक्षी दल के पास पर्याप्त संख्या में विधायक होने के बावजूद नेता प्रतिपक्ष का पद रिक्त पड़ा है।

हरियाणा विधानसभा में इस समय कांग्रेस के 37 विधायक मौजूद हैं, जो विपक्ष में सबसे बड़ा दल है। यह संख्या नेता प्रतिपक्ष की मान्यता के लिए पर्याप्त है, लेकिन कांग्रेस अब तक अपने विधायक दल का नेता नहीं चुन पाई है। इसी कारण विधानसभा अध्यक्ष हरविन्द्र कल्याण द्वारा इस पद पर किसी को मान्यता भी नहीं दी गई।

विपक्षी पार्टी फिर भी नेता प्रतिपक्ष नहीं

हरियाणा विधानसभा के बीते छह दशकों के इतिहास में यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में विपक्षी विधायक मौजूद होने के बावजूद नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति नहीं हो सकी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के भीतर गहरी मतभेद और नेतृत्व को लेकर असहमति व्याप्त है। हालांकि यह स्थिति सरकार के लिए राजनीतिक रूप से अनुकूल हो सकती है, परंतु लोकतंत्र के लिहाज से यह एक गंभीर स्थिति है।

हुड्डा की दावेदारी के बावजूद फैसला अधर में

नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर सबसे प्रबल दावेदार पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा माने जा रहे थे। पिछली 14वीं विधानसभा में भी वे नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं। बावजूद इसके, कांग्रेस अब तक इस पद पर निर्णय नहीं ले पाई है। बताया जा रहा है कि पार्टी के भीतर गुटबाजी और शीर्ष नेतृत्व से सहमति न बन पाने के चलते यह मामला लटका हुआ है। चुनाव के बाद से ही कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर खींचतान जारी है, जिससे विपक्ष की भूमिका भी प्रभावित हो रही है।

हुड्डा को चंडीगढ़ में जो सरकारी कोठी (सेक्टर 7) बतौर नेता प्रतिपक्ष मिली थी, उसे उन्होंने अब तक खाली नहीं किया है, जबकि उनका कार्यकाल समाप्त हो चुका है। इससे उन्हें पीनल रेंट (जुर्माना शुल्क) भरना पड़ रहा है, जो हर महीने बढ़ता जा रहा है।

कानूनी दृष्टि से नेता प्रतिपक्ष एक वैधानिक पद

हरियाणा में नेता प्रतिपक्ष का पद केवल एक परंपरा भर नहीं, बल्कि एक वैधानिक पद है। हरियाणा विधानसभा (सदस्यों का वेतन, भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1975 की धारा 2(डी) में नेता प्रतिपक्ष को परिभाषित किया गया है। इसके अतिरिक्त धारा 4 में इस पद से संबंधित वेतन, भत्तों और सुविधाओं का स्पष्ट उल्लेख है। इस पद पर नियुक्त व्यक्ति को कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा प्राप्त होता है। फिर भी कांग्रेस के अंदरूनी झगड़े के कारण यह संवैधानिक व्यवस्था पूरी नहीं हो पा रही है। इससे न केवल विपक्ष की प्रभावशीलता पर असर पड़ रहा है, बल्कि विधानसभा में जनहित के मुद्दे भी पर्याप्त रूप से नहीं उठ पा रहे हैं।

सरकारी खजाने को 50 लाख की राहत

नेता प्रतिपक्ष का दर्जा मिलने पर संबंधित व्यक्ति को हर महीने चार से पांच लाख रुपये तक का वेतन, भत्ता, आवास, स्टाफ और अन्य सुविधाएं मिलती हैं। ऐसे में नौ महीनों तक यह पद खाली रहने से प्रदेश सरकार के खजाने पर अनुमानित 50 लाख रुपये का बोझ नहीं पड़ा है। सरकार ने इस राशि को बचा तो लिया, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह बचत लोकतंत्र की कीमत पर हुई है?

विपक्ष की गैर-मौजूदगी से विधानसभा की कार्यवाही एकपक्षीय होती जा रही है, जो लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। विपक्ष न केवल सरकार की जवाबदेही तय करता है, बल्कि नीति निर्माण में संतुलन भी लाता है। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष की गैर-मौजूदगी सरकार को बिना चुनौती के कार्य करने की छूट देती है।

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