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धामी में दिवाली के दूसरे दिन खेली गई ‘पत्थर का खेल’ की अनोखी परंपरा, खून से हुआ मां भद्रकाली का तिलक

Written by:Neha Sharma
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राजधानी शिमला से सटे हलोग धामी में दिवाली के दूसरे दिन मंगलवार को सदियों पुरानी ‘पत्थर का खेल’ की परंपरा निभाई गई। यह परंपरा सदियों पुरानी है और कभी मानव बलि के विकल्प के रूप में शुरू की गई थी।
धामी में दिवाली के दूसरे दिन खेली गई ‘पत्थर का खेल’ की अनोखी परंपरा, खून से हुआ मां भद्रकाली का तिलक

राजधानी शिमला से सटे हलोग धामी में दिवाली के दूसरे दिन मंगलवार को सदियों पुरानी ‘पत्थर का खेल’ की परंपरा निभाई गई। यह अनोखा खेल धामी के ‘खेल का चौरा’ नामक स्थान पर आयोजित हुआ, जहां घाटी के दोनों ओर से जमोगी और कटेड़ू टोलियों ने एक-दूसरे पर पत्थरों की बारिश की। दोपहर चार बजे शुरू हुआ यह खेल करीब 40 मिनट तक चला। इस दौरान कटेड़ू टोली के सुभाष के हाथ में पत्थर लगने से खून निकल आया, जिसके बाद उनके खून से मां भद्रकाली मंदिर में तिलक किया गया और परंपरा का समापन हुआ।

ढोल-नगाड़ों के बीच शुरू हुआ आयोजन

शिमला से करीब 35 किलोमीटर दूर धामी में दोपहर तीन बजे राजपरिवार के उत्तराधिकारी जगदीप सिंह, पुजारी तनुज और राकेश शर्मा ने पूजा-अर्चना के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। ढोल-नगाड़ों की थाप पर शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें पुष्पेंद्र सिंह, दुर्गेश सिंह, रणजीत सिंह, चेतराम, लेख राम, बाबू राम, प्रकाश, हेत राम, प्रकाश नील समेत अनेक लोग शामिल हुए। करीब 3:40 बजे शोभायात्रा सती शारदा स्मारक पहुंची, जहां माथा टेकने के बाद आयोजकों के संकेत पर घाटी के दोनों ओर खड़े लोगों ने एक-दूसरे पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए।

पत्थर लगने पर खेल हुआ समाप्त

करीब 4:40 बजे कटेड़ू टोली के सुभाष के हाथ में पत्थर लगने पर आयोजकों ने खेल रोकने का संकेत दिया। परंपरा के अनुसार, यह घटना खेल के अंत का प्रतीक मानी जाती है। सुभाष के खून से मां भद्रकाली के मंदिर में तिलक कर प्रथा पूरी की गई। इसके बाद उन्हें प्राथमिक उपचार दिया गया। इस आयोजन में जमोगी टोली की ओर से जनिया, जमोगी, प्लानिया, कोठी, चईंयां और ओखरू गांव के लोग शामिल हुए, जबकि कटेड़ू टोली में तुनड़ू, धगोई, बठमाणा और आसपास के गांवों के युवा भागीदार रहे।

राजपरिवार की अनोखी धार्मिक परंपरा

राजपरिवार के उत्तराधिकारी जगदीप सिंह ने बताया कि यह परंपरा सदियों पुरानी है और कभी मानव बलि के विकल्प के रूप में शुरू की गई थी। राजपरिवार की राजमाता ने क्षेत्र की शांति और सुरक्षा के लिए नरबलि की जगह इस खेल की शुरुआत की थी। खेल में चोट लगने पर निकलने वाले खून से मां भद्रकाली का तिलक किया जाता है, जो इस परंपरा का सबसे पवित्र क्षण माना जाता है।

कोरोना काल में भी निभाई गई परंपरा

जगदीप सिंह ने बताया कि कोविड महामारी के दौरान जब आयोजन संभव नहीं था, तब उन्होंने स्वयं अपने खून से मां भद्रकाली का तिलक कर इस परंपरा को टूटने नहीं दिया। उनका कहना है कि यह केवल एक खेल नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और क्षेत्रीय एकता का प्रतीक है, जो सदियों से बिना रुके निभाई जा रही है।

 

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