राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने हाल ही में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला का तीन दिवसीय महत्वपूर्ण दौरा किया। दरअसल इस दौरे का मुख्य आकर्षण तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के साथ उनकी अनौपचारिक भेंट रही, जहां उन्होंने दलाई लामा को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने के विषय पर गहन चर्चा की। वहीं होसबाले का यह उच्च-स्तरीय प्रवास केवल एक सामान्य मुलाकात नहीं थी, बल्कि इसे हिमालयी भू-राजनीति और वैश्विक कूटनीति के व्यापक संदर्भ में अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

दरअसल दलाई लामा से उनकी इस मुलाकात ने भारत के पड़ोसी देश चीन की राजधानी बीजिंग से लेकर भारत की राजधानी दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी हलचल पैदा कर दी है। वहीं संघ द्वारा दलाई लामा को भारत रत्न देने की जोरदार वकालत को तिब्बत मुद्दे पर भारत की सांस्कृतिक और नैतिक स्थिति को और अधिक सशक्त करने के एक रणनीतिक कदम के तौर पर देखा जा रहा है।

विशेष रूप से चीन को स्पष्ट संदेश दिया

वहीं राजनीतिक विश्लेषकों और रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के सर्वोच्च नागरिक सम्मान की सिफारिश करके संघ ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से चीन को एक बहुत ही स्पष्ट संदेश दिया है। दरअसल यह संदेश है कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता के लिए तिब्बत का मुद्दा सदैव प्राथमिकता पर रहेगा और भारत इसे किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं कर सकता। यह पहल भारत की तिब्बत नीति को लेकर एक मजबूत और सार्वजनिक संकेत देती है, जो लंबे समय से चीन के साथ भारत के संबंधों में एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण बिंदु बना रहा है। संघ का यह कदम भारत के ‘सॉफ्ट पावर’ कूटनीति को भी मजबूत करता है।

बौद्ध-सनातन एकता पर जोर

दरअसल अपने धर्मशाला प्रवास के दौरान, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने केवल कूटनीतिक मुलाकातें ही नहीं कीं, बल्कि उन्होंने एक महत्वपूर्ण बौद्ध सम्मेलन को भी संबोधित किया। इस सम्मेलन में उन्होंने भारत की समृद्ध और साझा सांस्कृतिक विरासत पर विशेष जोर दिया, जिसके मूल में बौद्ध और सनातन परंपराएं निहित हैं। होसबाले ने अपने संबोधन में यह स्पष्ट रूप से कहा कि बौद्ध दर्शन और सनातन परंपराएं वास्तव में एक ही मूल से उत्पन्न हुई हैं जो दोनों के बीच एक गहरे ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक संबंध को दर्शाती हैं।

प्राचीन ज्ञान परंपराओं की एकता को दिखाता है दत्तात्रेय का बयान

वहीं उनका यह बयान भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं की एकता को दिखाता है। उनकी उपस्थिति ने पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठनात्मक आधार को और मजबूत करने में अभूतपूर्व मदद की। इस यात्रा के दौरान युवा नेतृत्व को राष्ट्रवाद की एक नई और समावेशी परिभाषा से परिचित कराया गया, जिसमें सांस्कृतिक जड़ों, राष्ट्रीय सुरक्षा, तिब्बत मुद्दे के महत्व और ‘अभिन्न भारतीयता’ के मूल्यों पर विशेष जोर दिया गया। दरअसल युवाओं की इस उत्साहपूर्वक भागीदारी को संघ के भविष्य के लिए एक अत्यंत शुभ संकेत माना जा रहा है, विशेष रूप से उन सीमावर्ती क्षेत्रों में जहां चीन की सांस्कृतिक और राजनीतिक घुसपैठ एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। इस तरह के कार्यक्रम युवाओं को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने और उनमें देशभक्ति की भावना भरने में सहायक होते हैं।