
हिमाचल प्रदेश में नदियों पर बन रही जलविद्युत परियोजनाओं और उनसे होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को लेकर एक जनहित याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई है। याचिका में 14 सितंबर 2006 की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसमें 25 मेगावाट से कम क्षमता वाली नदी घाटी और जलविद्युत परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी से छूट दी गई थी। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह छूट नदियों और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरनाक है और इसे खत्म किया जाना चाहिए।
जलविद्युत परियोजनाओं पर हाईकोर्ट सख्त
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावलिया और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए राज्य और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किए हैं। अदालत ने इस मुद्दे को गंभीर मानते हुए नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय को भी प्रतिवादी बनाया है। अगली सुनवाई 29 अक्तूबर को होगी। अदालत ने साफ किया है कि यह मामला सीधे तौर पर पर्यावरणीय सुरक्षा और हिमाचल प्रदेश की नाजुक पारिस्थितिकी से जुड़ा है।
याचिका में विशेष रूप से किन्नौर जिले के शोंगटोंग कड़छम में 402 मेगावाट के हाइड्रो प्रोजेक्ट का उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि 2007 में जारी पत्र में भी बादल फटने, ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड, बाढ़, भूकंप और भूस्खलन जैसी आपदाओं के जोखिमों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता बताई गई थी। अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि सतलुज नदी पर भाखड़ा से लेकर जंगी थोपन तक कई परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें 25 मेगावाट से कम क्षमता वाले कूट (24 मेगावाट) और अहोणा (22.5 मेगावाट) जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं, जिन्हें मंजूरी की जरूरत नहीं पड़ती।
इसी तरह, ब्यास बेसिन में भी 51 जलविद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं, जिनमें से 18 की क्षमता 25 मेगावाट से कम है। अब तक 282.090 मेगावाट की क्षमता वाले 22 प्रोजेक्ट चालू हो चुके हैं, 947 मेगावाट के पांच प्रोजेक्ट निर्माणाधीन हैं और 4 अभी आवंटित किए जाने बाकी हैं। प्रस्तावित 24 प्रोजेक्टों में केवल चार की क्षमता 50 मेगावाट से अधिक है जिन्हें पर्यावरण मंजूरी चाहिए, जबकि बाकी 18 छोटे प्रोजेक्ट बिना किसी पर्यावरण मूल्यांकन के चल रहे हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि नदियों के दोहन और जलविद्युत परियोजनाओं की स्थापना को पर्यावरणीय दृष्टिकोण से नए सिरे से जांचने की जरूरत है, इसी कारण यह याचिका दायर की गई है।
