हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में 68 साल पुराना केस जीतने के बाद बल्ह निवासी मीर बख्श को 92 बीघा जमीन देने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। न्यायालय के आदेश के बाद सरकार ने मंडी जिला प्रशासन को जमीन चिन्हित करने के निर्देश दिए हैं। इस पर नाचन विधानसभा क्षेत्र के छातर और भौर में जमीन तय की गई है। हालांकि, इस कदम का स्थानीय स्तर पर विरोध भी शुरू हो गया है। शनिवार को नाचन विधायक विनोद कुमार के नेतृत्व में 12 पंचायतों, महिला मंडलों, पूर्व पंचायत प्रतिनिधियों और भाजपा कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधिमंडल एसडीएम सुंदरनगर से मिला और सरकार को ज्ञापन सौंपकर मांग की कि यह जमीन स्थानीय लोगों से न छीनी जाए।
जमीन देने की योजना पर शुरू हुआ विरोध
विधायक विनोद कुमार ने कहा कि छातर पंचायत में एग्रीकल्चर विभाग की वह जमीन शामिल है जिसे दशकों पहले ग्रामीणों ने कृषि योजनाओं के संचालन के लिए दान में दिया था। इस जमीन पर अब राजीव गांधी डे बोर्डिंग स्कूल खोलने की योजना है। उन्होंने साफ किया कि यह जमीन किसी भी हाल में मीर बख्श को नहीं दी जाएगी। विनोद कुमार का कहना है कि यदि मीर बख्श की जमीन बल्ह में अधिग्रहित की गई थी तो उन्हें बदले में जमीन भी बल्ह में ही दी जानी चाहिए, न कि किसी अन्य क्षेत्र में।
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इसी तरह भौर क्षेत्र में भी सेरी कल्चर विभाग की जमीन चिन्हित की गई है। विधायक का कहना है कि इस जमीन को पूर्व सरकार के समय से इंडस्ट्रियल एरिया विकसित करने के लिए चिन्हित किया गया है। यहां औद्योगिक क्षेत्र बनने से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और उद्योग स्थापित होंगे। इसलिए इस जमीन को मीर बख्श को देना न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने कहा कि वे कोर्ट के आदेशों पर सवाल नहीं उठा रहे हैं, लेकिन सरकार और प्रशासन को यही सलाह है कि व्यक्ति को उसकी जमीन का मुआवजा उसी क्षेत्र में मिले, जहां से जमीन अधिग्रहित हुई है। अन्यथा, लोग सड़कों पर उतरकर विरोध करने के लिए मजबूर होंगे।
दरअसल, मीर बख्श की जमीन पर सरकार ने नेरचौक में मेडिकल कॉलेज और अन्य संस्थान बना दिए थे। इसको लेकर लंबी कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक चली। अदालत ने सरकार को आदेश दिया कि मीर बख्श को 92 बीघा जमीन दी जाए या फिर उन्हें 1061 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा अदा किया जाए। भारी मुआवजे से बचने के लिए सरकार अब उन्हें जमीन देने की दिशा में आगे बढ़ रही है। लेकिन नाचन और भौर में जमीन चिन्हित करने से नया विवाद खड़ा हो गया है, जिससे सरकार के लिए फैसला लेना मुश्किल हो सकता है।