
हिमाचल प्रदेश में वन विभाग द्वारा किए गए पौधरोपण कार्यों में भारी अनियमितताओं का खुलासा हुआ है। नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के मुताबिक, कई ऐसे स्थलों पर पौधरोपण दिखाया गया है जहां पहले से ही घने जंगल मौजूद थे। रिपोर्ट में कहा गया कि सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है और जमीनी स्तर पर काम हुआ ही नहीं। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने सोमवार को विधानसभा में कैग रिपोर्ट पेश की, जिसमें 2006 से मार्च 2021 तक की गतिविधियों और वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत अप्रैल 2016 से मार्च 2021 तक की ऑडिट रिपोर्ट शामिल है।
कैग रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
रिपोर्ट के अनुसार, वन विभाग जल विद्युत परियोजनाओं की लागत बढ़ने की जानकारी लेने और एजेंसियों से 198.73 करोड़ रुपये की अतिरिक्त निधि मांगने में विफल रहा। तीनों परियोजनाओं के लिए जलागम क्षेत्र शोधन योजना तक नहीं बनाई गई। बजोली होली प्रोजेक्ट में बिना स्थल निरीक्षण के ही पौधरोपण स्थल बदल दिए गए। रिपोर्ट में बताया गया कि 83 प्रतिशत वनीकरण कार्य खुले और अवक्रमित वनों के बाहर किए गए, जबकि 47 प्रतिशत पौधरोपण पहले से घने जंगल वाले इलाकों में दिखाया गया। यह सवाल खड़ा करता है कि जिन क्षेत्रों में पहले से ही घने जंगल मौजूद थे, वहां नए पौधरोपण की क्या जरूरत थी।
कैग ने सरकार को कई सिफारिशें दी हैं। इनमें वन संरक्षण अधिनियम से जुड़े लंबित मामलों का जल्द निपटारा, ई-ग्रीन वॉच पोर्टल पर सही जानकारी अपलोड करना, जलविद्युत परियोजनाओं के लिए भूमि बैंक और केंद्रीकृत डाटाबेस तैयार करना शामिल है। साथ ही दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और निधियों के दुरुपयोग की जांच करने पर भी जोर दिया गया है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि ई-ग्रीन वॉच एप से अपलोड किए गए नौ पौधरोपण स्थलों में भी गड़बड़ी मिली। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक, हिमाचल के पौधरोपण स्थलों की फाइलें छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों से अपलोड दिखाई गईं। उदाहरण के लिए, सिराज मंडल की तनारा ब्रिज से पनवी रोड की फाइल छत्तीसगढ़ के बतौली से अपलोड हुई। इसी तरह कुल्लू के कई रोड प्रोजेक्ट झारखंड और यूपी से जुड़े दिखाए गए। इस तरह की अनियमितताओं ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
