अमेरिका की ‘डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस’ प्रमुख तुलसी गबार्ड ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। इस बात की जानकारी सामने आई है कि उनके पति एक बेहद दुर्लभ हड्डी के कैंसर से जूझ रहे हैं, और गबार्ड ने इस मुश्किल समय में उनके साथ रहने का फैसला किया है। तुलसी गबार्ड अमेरिका की शीर्ष खुफिया अधिकारी थीं, जिनके अधीन 18 गुप्त एजेंसियां काम करती थीं।
दरअसल फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार, गबार्ड ने शुक्रवार को ओवल ऑफिस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मुलाकात के दौरान उन्हें अपने इस्तीफे की जानकारी दी। ऑफिस ऑफ डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (ODNI) में उनका आखिरी दिन 30 जून होने की उम्मीद है। गबार्ड ने अपने इस्तीफे की चिट्ठी में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का धन्यवाद भी किया। उन्होंने कहा कि नेशनल इंटेलिजेंस ऑफिस का नेतृत्व करना उनके लिए सम्मान की बात रही है।
क्यों दिया इस्तीफा?
गबार्ड ने अपने 11 साल के वैवाहिक जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि उनके पति अब्राहम हमेशा उनके सबसे मजबूत सहारे रहे हैं। उन्होंने अपनी चिट्ठी में लिखा, “पूर्वी अफ्रीका में मेरी तैनाती हो, कोई राजनीतिक अभियान हो या फिर इस पद पर मेरी सेवा। हर मुश्किल समय में वे मजबूती से मेरे साथ खड़े रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि उनकी ताकत और प्यार ने मुझे हर चुनौती से लड़ने की शक्ति दी है। ऐसे में मैं उनसे यह उम्मीद नहीं कर सकती कि वह इस कठिन लड़ाई का अकेले सामना करें जबकि मैं इतने व्यस्त और जिम्मेदारी वाले पद पर बनी रहूं।
कहा अभी भी कई महत्वपूर्ण काम बाकी
गबार्ड ने यह भी कहा कि उन्होंने ऑफिस ऑफ डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (ODNI) में काम करते हुए खुफिया तंत्र में पारदर्शिता बढ़ाने और उसकी विश्वसनीयता बहाल करने की दिशा में अहम प्रगति की है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अभी भी कई महत्वपूर्ण काम बाकी हैं।
तुलसी गबार्ड के कार्यकाल के दौरान किए गए पाँच बड़े काम इस प्रकार हैं:
1. उन्होंने अमेरिका की खुफिया एजेंसियों में कई बड़े बदलाव शुरू किए। उन्होंने एजेंसियों का खर्च कम करने और स्टाफ घटाने की योजना चलाई, जिससे दावा किया गया कि अमेरिकी सरकार के करीब 70 करोड़ डॉलर हर साल बच सकते हैं।
2. सरकारी दफ्तरों में चल रहे डीईआई (डायवर्सिटी, इक्विटी और इन्क्लूजन) कार्यक्रम भी बंद कर दिए गए। ये कार्यक्रम अलग-अलग समुदायों को बराबरी और प्रतिनिधित्व देने के लिए चलाए जाते थे।
3. 5 लाख से ज्यादा सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक किए गए, जिनमें ट्रम्प-रूस जांच और पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी व रॉबर्ट एफ. केनेडी की हत्या से जुड़े रिकॉर्ड भी शामिल थे।
4. क्रॉसफायर हरिकेन जांच के दस्तावेज भी जारी किए गए। गबार्ड का कहना था कि 2016 के चुनाव में रूस के दखल से जुड़ी खुफिया जानकारी का इस्तेमाल ओबामा सरकार के कुछ अधिकारियों ने राजनीतिक तरीके से किया था, ताकि ट्रम्प की जीत पर सवाल उठाए जा सकें।
5. राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र ने 2025 में 10 हजार से ज्यादा ऐसे लोगों को अमेरिका में आने से रोका, जिनके संबंध कथित ड्रग्स और आतंक नेटवर्क से बताए गए। इसके अलावा 85 हजार से ज्यादा लोगों को आतंक निगरानी सूची में डाला गया।
राजनीतिक सफर भी काफी चर्चा में रहा
गबार्ड का राजनीतिक सफर भी काफी चर्चा में रहा है। वह एक दशक पहले लेफ्टिनेंट कर्नल के तौर पर इराक युद्ध में लड़ चुकी हैं और अमेरिकी आर्मी रिजर्विस्ट रही हैं। उन्होंने अक्टूबर 2022 में डेमोक्रेटिक पार्टी पर गंभीर आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी थी। गबार्ड का कहना था कि डेमोक्रेटिक पार्टी कुछ एलीट लोगों के कंट्रोल में आ चुकी है। उन्होंने पार्टी पर जंग की बातें करने, श्वेत लोगों का विरोध करने और नस्लभेदी ग्रुप में तब्दील होने का आरोप लगाया था। उन्होंने इस्लामी चरमपंथ को न रोक पाने के लिए डेमोक्रेटिक सरकार की आलोचना भी की थी।
गबार्ड 2016 के चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार थीं। बाद में उन्होंने हिलेरी क्लिंटन की जगह बर्नी सेंडर्स का समर्थन किया था। वह 2020 में भी राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक प्राइमरी की दौड़ में शामिल रहीं, जिसके बाद उन्होंने बाइडेन का साथ दिया था। 2022 में पार्टी छोड़ने के बाद गबार्ड ने फॉक्स न्यूज को ज्वाइन कर लिया था। वह वहां कई शो में को-होस्ट के तौर पर नजर आईं। गबार्ड ने 2022 के चुनाव में कई रिपब्लिकन उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार किया, तभी से यह माना जाने लगा था कि वे रिपब्लिकन पार्टी ज्वाइन कर सकती हैं। अमेरिकी संसद में रहते हुए गबार्ड ने ओबामा और बाइडेन सरकार की खूब आलोचना की थी। गबार्ड ने साल 2019 में तब सुर्खियां बटोरी थीं जब उन्होंने भारतवंशी कमला हैरिस को एक डिबेट में पछाड़ा था। दरअसल, दोनों 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति पद के दावेदारों में शामिल थे। इस दौरान दोनों के बीच प्राइमरी चुनाव के लिए बहस हुई थी, जिसमें कई सवालों का कमला जवाब नहीं दे सकीं।






