जबलपुर में मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में करोड़ों रुपए का बड़ा और सनसनीखेज बिल घोटाला सामने आया है। वहीं इसके बाद प्रभारी CMHO डॉ. संजय मिश्रा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। दरअसल जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि स्वास्थ्य विभाग के स्टोर में खरीदी गई सामग्री का एक भी सामान भौतिक रूप से नहीं पहुंचा था, लेकिन कागजों में एक करोड़ रुपए से अधिक के बिल दर्ज कर दिए गए थे। इतना ही नहीं, इन फर्जी बिलों में से 93 लाख रुपए का भुगतान भी नियमों के खिलाफ कर दिया गया था, जिससे सरकारी खजाने को बड़ा नुकसान हुआ है। यह मामला सरकारी धन के दुरुपयोग और प्रशासनिक लापरवाही की गंभीर तस्वीर सामने लाता है। कलेक्टर राघवेंद्र सिंह को जब इस वित्तीय गड़बड़ी और फर्जीवाड़े की शिकायत मिली थी, तब उन्होंने तुरंत मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश दिए थे।
दरअसल कलेक्टर राघवेंद्र सिंह को स्वास्थ्य विभाग में चल रहे इस फर्जीवाड़े की लगातार शिकायतें मिल रही थीं। इन शिकायतों में बताया गया था कि फर्जी बिलों के जरिए सरकारी खजाने को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इसके बाद कलेक्टर ने तुरंत एक विशेष जांच टीम बनाई और उसे स्वास्थ्य विभाग के भंडार गृह का भौतिक सत्यापन करने की जिम्मेदारी दी।
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स्टॉक रजिस्टर में सामान की खरीद और प्राप्ति की पूरी एंट्री दर्ज थी
बता दें कि जांच टीम जब 31 मार्च 2026 को स्वास्थ्य विभाग के स्टोर पहुंची, तो वहां का नजारा देखकर अधिकारी खुद हैरान रह गए थे। स्टॉक रजिस्टर में सामान की खरीद और प्राप्ति की पूरी एंट्री दर्ज थी, जिससे ऐसा लग रहा था कि सब कुछ नियमों के अनुसार खरीदा गया है। लेकिन जब टीम ने स्टोर के अंदर जाकर सामान का भौतिक मिलान करना चाहा, तो वहां स्टॉक रजिस्टर में दर्ज एक भी सामान मौजूद नहीं था। पूरा भंडार गृह खाली पड़ा था। इससे साफ हो गया कि पूरा काम सिर्फ कागजों में ही दिखाया गया था और सरकारी धन की हेराफेरी की गई थी।
फर्जी बिलों और उनके भुगतान की चौंकाने वाली जानकारी सामने आई
जांच टीम ने इस मामले की गहराई से जांच की और सभी संबंधित रिकॉर्ड और दस्तावेजों की पड़ताल की। इसमें फर्जी बिलों और उनके भुगतान की चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। पता चला कि 17 मार्च को छह अलग-अलग बिल और 24 मार्च को सात अन्य बिल स्टॉक रजिस्टर में दर्ज किए गए थे। इस तरह कुल 13 बिल दर्ज किए गए थे। इन सभी बिलों की कुल राशि 1,00,74,998 रुपए थी। यह केवल कागजों में दर्ज आंकड़े नहीं थे, बल्कि इन बिलों को सही दिखाकर उनका भुगतान भी कर दिया गया था।
नियमों की अनदेखी करते हुए कुल 13 बिलों में से 12 बिलों का 93,04,998 रुपए का भुगतान कर दिया गया था। यह भुगतान उस सामान के लिए किया गया था जो वास्तव में स्वास्थ्य विभाग के स्टोर तक कभी पहुंचा ही नहीं था। यानी जिसका कोई भौतिक अस्तित्व ही नहीं था।
इस पूरे घोटाले में कई अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई है। जांच के दौरान उनके बयानों से भी इस बात के संकेत मिले हैं। जब फार्मासिस्ट जवाहर लोधी से इस मामले में पूछताछ की गई, तो उन्होंने चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने कहा, “सामान नहीं आया था, मैंने सिर्फ DPM आदित्य तिवारी के कहने पर स्टॉक रजिस्टर में एंट्री की थी।” लोधी का यह बयान इस बात की पुष्टि करता है कि सामान की डिलीवरी के बिना ही कागजों में एंट्री की गई थी और यह काम वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर हुआ था।
वहीं इस मामले में अन्य अधिकारियों ने भी सच्चाई छिपाने की कोशिश की। स्टोर कीपर नीरज कौरव ने जांच दल को बताया कि “सामान भंडार गृह में है।” लेकिन जब जांच टीम ने मौके पर जाकर भंडार गृह की जांच की, तो यह जानकारी पूरी तरह गलत निकली क्योंकि वहां कोई सामान मौजूद नहीं था।
इसी मामले में DPM आदित्य तिवारी, जिनका नाम फार्मासिस्ट जवाहर लोधी ने लिया था, उन्होंने भी सच्चाई से बचने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि “सामान आंशिक रूप से मिला है।” लेकिन जांच टीम को मौके पर एक भी सामान नहीं मिला, जिससे उनका दावा भी गलत साबित हुआ और उनकी भूमिका पर भी सवाल खड़े हो गए।
इन सभी तथ्यों, दस्तावेजों और अधिकारियों के विरोधाभासी बयानों के आधार पर जांच टीम इस नतीजे पर पहुंची है कि जबलपुर स्वास्थ्य विभाग में यह करोड़ों रुपए का बिल घोटाला सुनियोजित तरीके से किया गया था। इसमें सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है और कई स्तरों पर अधिकारियों की मिलीभगत सामने आई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश शासन ने प्रभारी CMHO डॉ. संजय मिश्रा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। इस पूरे मामले में आगे और भी अधिकारियों पर कार्रवाई होने की संभावना है, क्योंकि शुरुआती जांच में ही कई परतें सामने आ चुकी हैं और आगे कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।