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कुलपति डॉ. पी.के. मिश्रा की मौजूदगी में पौध किस्म संरक्षण कार्यक्रम, डॉ. स्तुति शर्मा की परियोजना को राष्ट्रीय पहचान, फिर खेतों में लहलहाएगी विलुप्त होती धान

Written by:Banshika Sharma
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जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर में पौध किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ। कुलपति डॉ पीके मिश्रा की उपस्थिति में PPV&FR अधिनियम के तहत देशी धान किस्मों को उगाने वाले किसानों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए, जिसमें डॉ स्तुति शर्मा की परियोजना को संस्थान के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया गया।
कुलपति डॉ. पी.के. मिश्रा की मौजूदगी में पौध किस्म संरक्षण कार्यक्रम, डॉ. स्तुति शर्मा की परियोजना को राष्ट्रीय पहचान, फिर खेतों में लहलहाएगी विलुप्त होती धान

जबलपुर स्थित जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में 13 फरवरी को पौध किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण-सह-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। जेनेटिक्स एवं प्लांट ब्रीडिंग विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में कुलपति डॉ पीके मिश्रा भी मौजूद रहे।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य PPV&FR अधिनियम के अंतर्गत पौध किस्म पंजीकरण और कृषक अधिकारों के प्रति किसानों में जागरूकता बढ़ाना था। इस अवसर पर देशी धान सहित पारंपरिक फसलों की विभिन्न किस्में उगाने वाले किसानों को पौध किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।

डॉ स्तुति शर्मा की परियोजना को मिला राष्ट्रीय दर्जा

परियोजना की प्रधान अन्वेषक डॉ स्तुति शर्मा की अगुवाई में मध्यप्रदेश की कृषक किस्मों के पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी की गई है। विश्वविद्यालय को PPV&FR अधिनियम के अंतर्गत प्रदेश से कृषक किस्मों के पंजीकरण का दर्जा मिला है, जिसे संस्थान के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

डॉ स्तुति शर्मा ने बताया कि परियोजना का मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिकों और किसानों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए स्थानीय किस्मों का दस्तावेजीकरण और संरक्षण सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही विलुप्त होती देशी धान किस्मों को दोबारा खेती में लाने पर भी काम किया जा रहा है।

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पारंपरिक ज्ञान को कानूनी संरक्षण

इस पहल के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान, देशी बीजों और स्थानीय किस्मों को कानूनी संरक्षण देने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। कार्यक्रम में यह स्पष्ट किया गया कि किसानों में अपने बीज, अपनी किस्म और अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

कुलपति डॉ पीके मिश्रा ने कहा कि विश्वविद्यालय पारंपरिक फसलों के संरक्षण और कम लागत वाली कृषि पद्धतियों पर काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि इसका उद्देश्य किसानों को व्यावहारिक लाभ प्रदान करना है ताकि वे अपनी देशी किस्मों को संरक्षित रख सकें और उनसे बेहतर उत्पादन हासिल कर सकें।

व्यापक भागीदारी

कार्यक्रम में अनुसंधान एवं विस्तार सेवाओं से जुड़े अधिकारी, वैज्ञानिक, किसान और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। यह आयोजन मध्यप्रदेश में पारंपरिक कृषि पद्धतियों को पुनर्जीवित करने और किसानों के अधिकारों की रक्षा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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