Hindi News

नींद का डिज़ाइन : कैसे सोती है दुनिया, जानिए अलग-अलग संस्कृतियों और समाज में नींद से जुड़ी परंपराएं

Written by:Shruty Kushwaha
Last Updated:
हमारे देश में गांवों में आज भी खुले आंगन में सोना आम बात है। स्वीडन, नॉर्वे और आइसलैंड में शिशुओं को अक्सर ठंडी जलवायु में भी बाहर स्ट्रॉलर सुलाया जाता है। ऐसे ही कई अफ्रीकी समुदायों में सामूहिक रूप से सोने की परंपरा है और एक साथ कई पीढ़ियां एक ही कमरे में सोती हैं। वहीं, कई जगह बच्चों को लोकगीतों और ढोल की थाप के साथ सुलाने की परंपरा है।
नींद का डिज़ाइन : कैसे सोती है दुनिया, जानिए अलग-अलग संस्कृतियों और समाज में नींद से जुड़ी परंपराएं

AI generated

नींद हमारे जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है। नींद सिर्फ आराम नहीं है बल्कि शरीर, मन और मस्तिष्क के मरम्मत, संतुलन और पुनर्निर्माण का समय है। जब हम सोते हैं तब हमारा मस्तिष्क दिनभर की जानकारी को व्यवस्थित करता है, शरीर क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत करता है और प्रतिरक्षा प्रणाली सक्रिय रूप से रोगों से लड़ने की तैयारी करती है।

अलग-अलग देशों, समुदायों और समाज में सोने के तरीके, समय, स्थान और व्यवहार से जुड़ी कई तरह की सामाजिक, धार्मिक, पर्यावरणीय मान्यताएं और रीतियां जुड़ी हुई हैं। कहीं दोपहर की नींद को सम्मानजनक विराम माना जाता है तो कहीं खुले आंगन में सोने की परंपरा है। कोई समाज बच्चों को अकेले सुलाता है तो कोई सामूहिक नींद को पारिवारिक प्रेम का प्रतीक मानता है। आइए एक नज़र डालते हैं कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोग कैसे सोते हैं और नींद से जुड़ी क्या मान्यताएं हैं।

भारत: प्राकृतिक नींद और आयुर्वेद की मान्यताएं

भारत में नींद को स्वास्थ्य का आधार माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, रात की नींद, जिसे “भूतधात्री” कहा जाता है, सबसे स्वास्थ्यवर्धक है। यह मान्यता है कि रात में 7-8 घंटे की गहरी नींद शरीर की मरम्मत और दिमाग की कार्यक्षमता को बढ़ाती है। लोग अक्सर सोने से पहले गर्म दूध, बादाम या चेरी का सेवन करते हैं, क्योंकि इनमें मेलाटोनिन और मैग्नीशियम जैसे तत्व नींद को बढ़ावा देते हैं।

जापान: इनमुरी और संयमित नींद

जापान में “इनमुरी” (झपकी लेना) एक सामाजिक रूप से स्वीकार्य परंपरा है जहां लोग सार्वजनिक स्थानों जैसे ट्रेन या कार्यालय में छोटी-छोटी झपकियां लेते हैं। इसे थकान मिटाने और उत्पादकता बढ़ाने का तरीका माना जाता है। जापानी संस्कृति में नींद को अनुशासन के साथ जोड़ा जाता है, और रात में कम नींद 6-7 घंटे लेना आम है। वहां यह मान्यता है कि कम नींद स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है।

स्पेन: सिएस्ता की परंपरा

स्पेन और कई लैटिन अमेरिकी देशों में “सिएस्ता” या दोपहर की झपकी एक पुरानी परंपरा है। दोपहर में 20-30 मिनट की नींद तरोताज़ा करने और गर्म मौसम में ऊर्जा बचाने के लिए ली जाती है। कई अध्ययन भी बताते हैं कि सिएस्ता एकाग्रता और उत्पादकता को बढ़ाती है। हालांकि, आधुनिक जीवनशैली और व्यस्त जीवन में यह परंपरा कम होती जा रही है।

अफ्रीकी जनजातियां: सामुदायिक नींद

अफ्रीका की कई जनजातियों जैसे मासाई और हिम्बा में सामुदायिक नींद लेने की परंपरा है। कई लोग, परिवार या समुदाय एक साथ एक ही स्थान पर सोते हैं। मान्यता है कि इससे सामाजिक बंधन मजबूत होते हैं। नींद को आत्मिक शांति और पूर्वजों से संपर्क का साधन माना जाता है। कुछ जनजातियों में यह विश्वास है कि सपने भविष्यवाणी भी करते हैं।

पश्चिमी देश: नींद की स्वच्छता

पश्चिमी देशों जैसे अमेरिका और ब्रिटेन में “नींद की स्वच्छता” पर बहुत जोर दिया जाता है। इसमें नियमित सोने का समय, शांत और अंधेरा कमरा और स्क्रीन फ्री वातावरण शामिल है। एक सर्वे के अनुसार, नब्बे प्रतिशत से ज्यादा लोग मानते हैं कि वे पूरी नींद नहीं ले पाते जिसका असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
Follow Us :GoogleNews