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गुरु के देह त्याग के बाद शिष्य की क्या होती है स्थिति? प्रेमानंद महाराज ने दिया भावुक उत्तर

Written by:Bhawna Choubey
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वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज के सत्संग में शिष्य ने पूछा एक बेहद भावुक सवाल गुरु के देह त्याग के बाद शिष्य का क्या होगा? जवाब में महाराज ने गुरु, नाम और साधना का ऐसा अर्थ समझाया, जो हर भक्त के मन को छू गया।
गुरु के देह त्याग के बाद शिष्य की क्या होती है स्थिति? प्रेमानंद महाराज ने दिया भावुक उत्तर

वृंदावन की पावन भूमि पर जब संत बोलते हैं, तो शब्द नहीं, अनुभूति बहती है। केली कुंज आश्रम में होने वाले प्रेमानंद महाराज के सत्संग केवल प्रवचन नहीं होते, बल्कि जीवन की उलझनों का समाधान बन जाते हैं। ऐसे ही एक सत्संग में शिष्यों के मन में एक ऐसा प्रश्न उठा, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को भीतर तक सोचने पर मजबूर कर दिया।

एक शिष्य ने अत्यंत विनम्रता और भावुकता से पूछा, “महाराज जी, आपके शरीर त्यागने के बाद हमारी क्या गति होगी और हमारे लिए आपकी क्या आज्ञा रहेगी?” यह प्रश्न केवल जिज्ञासा नहीं था, बल्कि गुरु से जुड़ाव, डर और भविष्य की चिंता का प्रतीक था। प्रेमानंद महाराज ने इसका उत्तर ऐसे शब्दों में दिया जो साधारण होते हुए भी गहरे अर्थ से भरे थे।

शिष्य का संवेदनशील सवाल 

सत्संग के दौरान जब शिष्य ने गुरु के देह त्याग से जुड़ा प्रश्न पूछा, तो पूरे वातावरण में एक गहरी शांति छा गई। यह सवाल केवल भविष्य को लेकर नहीं था, बल्कि गुरु के प्रति प्रेम और आश्रय की भावना से जुड़ा था। प्रेमानंद महाराज ने पहले शिष्य के भाव को समझा और फिर अत्यंत शांत स्वर में उत्तर देना शुरू किया। उन्होंने कहा कि जब तक महापुरुषों का शरीर इस धरती पर रहता है, तब तक उनके प्रभाव को प्रत्यक्ष रूप से महसूस किया जा सकता है। उनका सानिध्य, उनकी दृष्टि और उनका आशीर्वाद शिष्य को भीतर से मजबूत करता है।

गुरु के देह त्याग के बाद शिष्य की क्या होती है गति?

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रेमानंद महाराज ने कहा कि शिष्य की गति गुरु के शरीर से नहीं, बल्कि गुरु की वाणी, नाम और साधना से तय होती है। उन्होंने शिष्यों को आश्वस्त किया कि सच्चा गुरु कभी शिष्य को अकेला नहीं छोड़ता। गुरु का शरीर नश्वर है, लेकिन उनकी वाणी, उनके उपदेश और उनके द्वारा दिया गया नाम शाश्वत होता है। जो शिष्य गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलता है, वह कभी भटकता नहीं। प्रेमानंद महाराज ने कहा कि शिष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी गुरु की आज्ञा को जीवन में उतारना है।

गुरु की सबसे बड़ी आज्ञा

प्रेमानंद महाराज ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गुरु के देह त्याग के बाद शिष्यों के लिए उनकी सबसे बड़ी आज्ञा “नाम और वाणी” है। नाम जप और गुरु के सिद्धांतों का पालन ही शिष्य का सहारा बनता है। उन्होंने कहा कि जो शिष्य नियमित रूप से नाम-स्मरण करता है और गुरु की वाणी को अपने जीवन का आधार बनाता है, वह कभी अकेला नहीं होता। चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों, गुरु की कृपा उसके साथ चलती है।

 

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Bhawna Choubey
लेखक के बारे में
मुझे लगता है कि कलम में बहुत ताकत होती है और खबरें हमेशा सच सामने लाती हैं। इसी सच्चाई को सीखने और समझने के लिए मैं रोज़ाना पत्रकारिता के नए पहलुओं को सीखती हूँ। View all posts by Bhawna Choubey
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