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डॉन अबू सलेम की पैरोल याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट ने की खारिज, भाई के जनाजे के लिए आजमगढ़ जाने की मांगी थी अनुमति

Written by:Gaurav Sharma
Published:
बॉम्बे हाई कोर्ट ने अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम की पैरोल याचिका को खारिज कर दिया है। सलेम ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में अपने भाई के जनाजे में शामिल होने के लिए पैरोल मांगी थी, लेकिन अभियोजन पक्ष के कड़े विरोध और सुरक्षा कारणों के चलते कोर्ट ने यह अर्जी ठुकरा दी।
डॉन अबू सलेम की पैरोल याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट ने की खारिज, भाई के जनाजे के लिए आजमगढ़ जाने की मांगी थी अनुमति

महाराष्ट्र की नासिक जेल में बंद अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम को बॉम्बे हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने उसकी उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अपने भाई के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए पैरोल की मांग की थी। अभियोजन पक्ष ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए इसका पुरजोर विरोध किया, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

दरअसल, अबू सलेम के भाई अबू हकीम अंसारी का हाल ही में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ स्थित उनके पैतृक गांव में निधन हो गया था। इसकी जानकारी मिलने के बाद सलेम ने अपने वकील के माध्यम से कोर्ट में याचिका दायर कर मानवीय आधार पर पैरोल मांगी थी। वह अपने परिवार के साथ इस दुख की घड़ी में शामिल होना चाहता था।

सुरक्षा कारणों और खर्च को लेकर कोर्ट ने खारिज की अर्जी

सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले की संवेदनशीलता पर सबसे अधिक ध्यान दिया। कोर्ट ने माना कि अबू सलेम एक हाई-प्रोफाइल कैदी है और उसे सड़क या ट्रेन के रास्ते दूसरे राज्य ले जाना सुरक्षा के लिहाज से बेहद जोखिम भरा हो सकता है। सुरक्षा एजेंसियों ने भी इस यात्रा के दौरान कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताई थी।

इसके अलावा, सुनवाई में सुरक्षा पर होने वाले खर्च का मुद्दा भी उठा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर सलेम को आजमगढ़ ले जाया जाता है, तो पुलिस एस्कॉर्ट और सुरक्षा का पूरा खर्च उसे खुद वहन करना होगा। यह खर्च 17 लाख रुपये से अधिक बताया गया। इस पर सलेम के वकील ने तर्क दिया कि वह पिछले 25 वर्षों से जेल में है और उसकी आय का कोई स्रोत नहीं है, इसलिए वह इतनी बड़ी राशि का भुगतान नहीं कर सकता। सलेम की ओर से अधिकतम 1 लाख रुपये देने की पेशकश की गई, जो अपर्याप्त मानी गई।

वकील ने दी थी मानवीय संवेदनाओं की दलील

अबू सलेम के वकील ने कोर्ट में अपनी दलीलें रखते हुए कहा था कि यह याचिका केवल मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक दुख से जुड़ी है। उन्होंने तर्क दिया कि भाई के अंतिम संस्कार और अन्य रस्मों में शामिल होना सलेम की एक सामाजिक जिम्मेदारी है। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि सलेम की आपराधिक पृष्ठभूमि और उससे जुड़े खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के तर्कों को अधिक महत्व देते हुए याचिका को खारिज कर दिया।