
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बुधवार को स्पष्ट किया कि राज्य सरकार लोगों के खाने-पीने के विकल्पों में दखल देने में दिलचस्पी नहीं रखती। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कुछ शहरों में कसाईखानों और मांस की दुकानों को बंद रखने के आदेश पर जारी विवाद को उन्होंने “अनावश्यक” करार दिया। फडणवीस ने कहा कि 15 अगस्त जैसे विशेष अवसरों पर ऐसे फैसले नगर निगम स्तर पर लिए जाते हैं, न कि राज्य सरकार द्वारा। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें 37 साल पुराने उस सरकारी आदेश (जीआर) की जानकारी नहीं थी, जिसमें ऐसे अवसरों पर बूचड़खाने बंद रखने की अनुमति दी गई है।
फडणवीस ने कहा सरकार की कोई भूमिका नहीं
मुख्यमंत्री ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, “राज्य सरकार इस बात में दिलचस्पी नहीं रखती कि कौन क्या खाता है। हमारे सामने और भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।” उन्होंने इस बहस को गलत दिशा में ले जाने वालों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि कुछ लोग शाकाहार को लेकर आपत्तिजनक बातें कर रहे हैं, जैसे “शाकाहारी लोग नपुंसक होते हैं”। फडणवीस ने कहा कि इस तरह की “बकवास” तुरंत बंद होनी चाहिए। उन्होंने साफ किया कि राज्य सरकार ने मांस की दुकानों को बंद करने का कोई आदेश नहीं दिया और यह पूरी तरह से स्थानीय निकायों का निर्णय है।
फडणवीस ने कहा कि अगस्त 1988 में एक सरकारी आदेश जारी किया गया था, लेकिन इसके आधार पर बंदी का निर्णय संबंधित नगर निगम खुद लेते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें इस आदेश की मौजूदगी के बारे में हाल ही में मीडिया के जरिए पता चला। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि इस तरह के निर्णय उस समय भी लिए गए थे जब शिवसेना (यूबीटी) के नेता उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे।
इस विवाद पर उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने भी नाराजगी जताई और कहा कि इस तरह का प्रतिबंध गलत है। जानकारी के मुताबिक, मुंबई के पास ठाणे ज़िले के कल्याण-डोंबिवली, छत्रपति संभाजीनगर, नागपुर और नासिक ज़िले के मालेगांव नगर निगम ने 15 अगस्त को मांस की दुकानों को बंद रखने का आदेश दिया था। इस फैसले ने कई जगहों पर बहस को जन्म दिया है, लेकिन फडणवीस और पवार दोनों ने संकेत दिया है कि राज्य सरकार इसका समर्थन नहीं करती।
