शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने समान नागरिक संहिता (UCC) और पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा, दोनों ही मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी है। दरअसल उन्होंने यूसीसी को लेकर एक संतुलित लेकिन महत्वपूर्ण बयान दिया है, जिसमें कहा गया कि अगर इसे समानता के भाव से लाया जाए तो यह एक नेक इरादा है। हालांकि, उनका मानना है कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा के बयानों और उनकी भाषा को देखते हुए लगता है कि यूसीसी का इस्तेमाल ध्रुवीकरण के लिए किया जा सकता है।
दरअसल यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में यूसीसी को लेकर बहस तेज हो गई है। वहीं भाजपा शासित कुछ राज्य इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। प्रियंका चतुर्वेदी ने यूसीसी जैसे गंभीर और दूरगामी प्रभाव वाले कानून के लिए सर्वसम्मति और व्यापक विचार-विमर्श पर जोर दिया है।
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वहीं प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा है कि, “हम यह मांग कर रहे हैं कि सारे स्टेकहोल्डर्स से चर्चा होनी चाहिए। लोगों से बातचीत के बाद ही यह कानून आना चाहिए।” उनका तर्क है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जहां विभिन्न धर्मों और समुदायों के व्यक्तिगत कानून हैं, वहां सभी हितधारकों, विशेषकर अल्पसंख्यक समुदायों और महिला संगठनों के साथ विस्तृत संवाद के बिना कोई भी बड़ा बदलाव सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा सकता है। असम में, मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि भारतीय जनता पार्टी आगामी चुनाव में सत्ता में लौटती है, तो तीन महीने के भीतर राज्य में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी।
दरअसल प्रियंका चतुर्वेदी ने इसी घोषणा और इसके पीछे की राजनीतिक मंशा पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा है कि, “लेकिन असम में वहां के सीएम की भाषा और शब्दों को सुनेंगे तो समझ में आ सकता है कि यूसीसी किस तरीके से लागू होगी।” यह बयान सीधे तौर पर यूसीसी के नाम पर वोट बैंक की राजनीति करने की कोशिशों पर निशाना साधता है।
‘घुसपैठियों’ के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी
प्रियंका चतुर्वेदी ने असम के मुख्यमंत्री द्वारा लगातार दोहराए जा रहे ‘घुसपैठियों’ के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी, जिसे अक्सर यूसीसी की बहस से जोड़कर देखा जाता है। उन्होंने कहा कि अगर समानता को ध्यान में रखते हुए यह कानून बनता है तो वह एक नेक वादा है, लेकिन असम के मुख्यमंत्री के दृष्टिकोण को देखते हुए यह स्पष्ट है कि इससे ध्रुवीकरण होगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक पिछले बयान का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘घुसपैठ’ को चुनावी मुद्दा न बनाकर राष्ट्रीय सुरक्षा के माध्यम से देखा जाना चाहिए। चतुर्वेदी ने प्रधानमंत्री के इस विचार का सम्मान करते हुए कहा कि यह मुद्दा वाकई में राजनीतिक एजेंडा नहीं बन सकता। इसके बाद उन्होंने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा, “सबसे पहला सवाल तो देश के गृहमंत्री को आएगा कि आपकी 11 सालों से सरकार है, आप इतने सालों से क्या कर रहे थे।”
पश्चिम बंगाल चुनाव हिंसा पर चुनाव आयोग से सवाल
वहीं यूसीसी और असम के राजनीतिक पर अपनी राय रखने के बाद, प्रियंका चतुर्वेदी ने चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में लगातार सामने आ रही हिंसा की घटनाओं पर भी गहरी चिंता व्यक्त की है। दरअसल उन्होंने कहा कि “पश्चिम बंगाल के हर चुनाव में हमें हिंसा की खबरें सुनने को मिलती हैं। ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। ये सालों से चला आ रहा है। इसको कहीं न कहीं खत्म करना पड़ेगा।” चतुर्वेदी ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र में चुनाव, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण सुनिश्चित करने का माध्यम होते हैं, न कि जानमाल के नुकसान या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में हिंसा का है। उन्होंने कहा, “इलेक्शन और पावर के चलते लोगों की जान जाए, जानमाल का नुकसान हो, ये गलत है।” यह बयान चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता और नागरिकों के जीवन के अधिकार की रक्षा के महत्व को रेखांकित करता है।
इस पूरे मामले में उन्होंने भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) और राज्य चुनाव आयोग की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल उठाया है। दरअसल प्रियंका चतुर्वेदी ने पूछा, “चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग क्या कर रहा है?” उन्होंने याद दिलाया कि पश्चिम बंगाल में आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) लागू हो चुकी है, जिसके तहत चुनाव आयोग के पास व्यापक अधिकार होते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने के लिए काफी सारे नौकरशाहों का ट्रांसफर भी कर दिया है। ऐसे में, राज्य में हो रही हिंसा की घटनाओं की सीधी जवाबदेही चुनाव आयोग की बनती है।