मेडिकल स्टोर पर उड़ रही सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां

मेडिकल स्टोर पर उड़ रही सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां

मुरैना|संजय दीक्षित| कोरोना (Corona) महामारी में सोशल डिस्टेंस (Social distance) की धज्जियां सरेआम उड़ाई जा रही हैं। जिसका जीता जागता उदाहरण बीएल मेडिकल स्टोर (Medical Store) पर देखा जा सकता हैं | महज 500 मीटर की दूरी पर जिला अस्पताल हैं वहां भी कई पुलिकर्मी तैनात किए गए है। वहीं खड़े पुलिकर्मी ने बताया कि कई बार समझाईश दी गयी हैं लेकिन बीएल मेडिकल स्टोर के संचालक सरेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं और बाइक सवार बीच रास्ते मे लगाकर चले जाते है जिससे रास्ता अवरुद्ध हो रहा है।

एक तरफ पूरे शहर में लॉकडाउन (Lockdown) के नियमों के लिए नगर निगम की गाड़ियों से अनोउंसमेन्ट किया जा रहा है तो वही शहर के बीचों बीच लोक डाउन की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।अभी शहर में कोरोना का कहर थमा नही हैं इसे बाबजूद सारे नियमो को ताक पर रखकर अवेहलना की जा रही हैं।कई लोग तो बिना मास्क के खड़े हुए भी नजर आ रहे थे जिन्हें पेरमिशन देकर अंदर चेकअप किया जा रहा था।जिला अस्पताल के बगल से बने बीएल मेडिकल में सरकारी डॉक्टर के क्लीनिक भी बने हुए है।इसके बाबजूद भी सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।जिला अस्पताल में पदस्थ डॉ राघवेंद्र यादव ने आमजनता से अपील की हैं कि घर से बाहर मास्क लगाकर ही निकलें अन्यथा घर पर रहें ।कोरोना का कहर थमा नही हैं।बार बार अपील के बाबजूद लोग घरों से बाहर निकल रहे हैं और सोशल डिस्टेंस की धज्जियां उड़ाते नजर आ रहे हैं।जिसके लिए जिला प्रशासन को सख्त कदम उठाना पड़ेगा नही तो आने वाले समय मे बड़े नुकसान का सामना करना पड़ सकता है|

Gaurav Sharma
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निदेशक और संपादक

पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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