वोट चोरी के आरोपों और विपक्ष के प्रदर्शन के बीच 42 पूर्व जजों ने भारत की जनता के नाम खुला पत्र लिखा है, पत्र लिखने वाले जजों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज से लेकर कई अन्य राज्यों के पूर्व जज शामिल हैं, इन सभी पूर्व जजों ने चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करने की कोशिशों पर गहरी चिंता जताई है। गौरतलब है कि पिछले कई दिनों से विपक्ष देश की संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है।

राहुल गांधी, प्रियंका गांधी सहित विपक्ष के कई सांसद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को वोट चोर कहकर उनपर हमलावर हैं और इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं, विपक्षी पार्टियाँ चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठा रही हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह पर वोट चोरी कर सरकार बनाने और ज्ञानेश कुमार पर उनकी मदद करने का आरोप लगा रही है, राहुल गांधी इस मुद्दे को लेकर पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद से ही मुखर हैं।

राहुल गांधी CEC ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी के आरोप लगा रहे हैं   

पिछले कई दिनों से देश में वोट चोरी के खिलाफ आंदोलन कर रहे राहुल गांधी पिछले तीन दिनों से दिल्ली की सड़कों पर हैं , वे मंगलवार को चुनाव आयोग पर सैकड़ों लोगों के साथ प्रदर्शन करने पहुंचें, कल उन्होंने जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया और आज एक बार फिर राजघाट पर उन्होंने प्रदर्शन किया, राहुल गांधी का कहना है कि ज्ञानेश कुमार ने वोट चोरी करवाकर जनता के वोट के अधिकार को छीनकर अपराध किया है उन्हें इस्तीफा देना होगा और हम इस्तीफा लेकर रहेंगे।

पत्र में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के 42 पूर्व जजों हस्ताक्षर    

देश में पिछले तीन दिनों से हो रहे घटनाक्रम के बीच 42 पूर्व जजों का खुला पत्र आज चर्चा में आया है, पत्र में 7 अक्टूबर 20 26 की तारीख लिखी है, बताया जा रहा है कि कल जो कुछ जंतर मंतर पर हुआ उसके बार ये कल शाम ये पत्र देश की जनता के नाम  पूर्व जजों ने लिखा है पत्र में पूर्व जजों ने अपना नाम और वे कहाँ पदस्थ रहे  इसका उल्लेख भी किया है।

संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार, लेकिन उन्हें नीचा दिखाना नहीं

अंग्रेजी में लिखे तीन पेज के पत्र में 42 पूर्व जजों ने चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करने की कोशिशों पर गहरी चिंता जताई है। पत्र पर हस्ताक्षर करने वैल पूर्व जजों ने बिना किसी सबूत के “वोट चोरी” के आरोपों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि संवैधानिक संस्थाओं को बार-बार “चोर” और “समझौता करने वाला” (यानी मिलीभगत वाला) बताना लोकतंत्र में जनता के भरोसे को कम कर सकता है। पत्र में कहा गया है, “संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें नीचा दिखाना नहीं।”

जजों ने लिखा – ऐसे समय में चुप रहना अब कोई निष्पक्ष विकल्प नहीं है

तीन पेज के पत्र के पहले पेज पर जजों ने लिखा- “हम पूर्व जजों और संवैधानिक पदों पर रहे रिटायर्ड अधिकारियों के तौर पर लिख रहे हैं। हमारा किसी भी राजनीतिक पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है। हम इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि ऐसे समय में चुप रहना अब कोई निष्पक्ष विकल्प नहीं है। हमारी चिंता गंभीर है। भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हमले हो रहे हैं। भारत का चुनाव आयोग इन हमलों के केंद्र में है। यहाँ तक कि उच्च न्यायपालिका, जिसका हम बहुत सम्मान करते हैं, और वैधानिक एजेंसियों को भी नहीं बख्शा गया है।”

“ये हमले तर्कसंगत आलोचना नहीं हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह निहित राजनीतिक हितों से प्रेरित एक सुनियोजित अभियान है, जिसमें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अस्थिर करने के संभावित विनाशकारी परिणामों की कोई परवाह नहीं है। संस्थानों की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें बदनाम करना नहीं। अब सार्वजनिक मंचों से संवैधानिक अधिकारियों को “चोर”, “कठपुतली” और “समझौता करने वाला” कहा जाता है।”

“चुनाव कराने वाले अधिकारियों का नाम लेकर उन्हें शर्मिंदा किया जाता है और सत्ता बदलने पर कार्रवाई की खुली धमकी दी जाती है। किसी भी अदालत ने इनमें से किसी भी आरोप को सही नहीं पाया है। “वोट चोरी” के आरोप प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए जाते हैं, न कि अदालतों में। जब आयोग शपथ-पत्र मांगता है, तो कोई शपथ-पत्र दाखिल नहीं किया जाता। हारने के बाद ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर दोष मढ़ा जाता है। उन्हीं मशीनों से मिली जीत पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता। जो पार्टी पांच दशकों से ज़्यादा समय तक देश पर शासन करती रही, वही अब दावा कर रही है कि जिस सिस्टम ने उसे चुना, उसी में धांधली हुई है।”

“यह अकेले काम नहीं करता। चुनिंदा मामलों में कानूनी लड़ाई लड़ने का लंबा इतिहास रखने वाले एक्टिविस्ट संगठन इन दावों को कानूनी रूप देते हैं। वे एक के बाद एक याचिकाएँ दायर करते हैं। वे शायद ही कभी सबूत पेश करते हैं। कोर्टरूम एक मंच बन जाता है, और जब फ़ैसला आता है, तो अगर वह उनके फ़ायदे का न हो, तो उसकी आलोचना की जाती है। इसके बाद, एक अच्छी तरह से स्थापित और व्यापक रूप से भरोसेमंद न्यायिक प्रणाली में जनता का भरोसा कम करने के जानबूझकर किए गए मकसद से, नफ़रत को बड़े पैमाने पर बढ़ाया और फैलाया जाता है।”