नई दिल्ली: भारत में दान देने की परंपरा कितनी गहरी है, इसका अंदाजा ‘हाउ इंडिया गिव्स’ रिपोर्ट के तीसरे संस्करण से लगाया जा सकता है। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश के आम घर हर साल लगभग 54 हजार करोड़ रुपये दान के रूप में देते हैं। यह अध्ययन भारतीय समाज की उस उदारता को दर्शाता है जिसे अक्सर कम आंका जाता है।
यह रिपोर्ट 20 राज्यों में किए गए एक विस्तृत सर्वेक्षण पर आधारित है, जिसका मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि आम भारतीय नकद, सामान या सेवा के रूप में सामाजिक कार्यों में कैसे और कितना योगदान देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वे में शामिल 68% लोगों ने किसी न किसी रूप में दान देने की बात स्वीकार की है।
सबसे ज्यादा दान धार्मिक संगठनों को
रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले निष्कर्षों में से एक यह है कि व्यक्तिगत दान का सबसे बड़ा हिस्सा कहां जाता है। आंकड़ों के मुताबिक, कुल दान का 45.9% हिस्सा सीधे धार्मिक संगठनों को मिलता है। इसके बाद 41.8% दान बेहद गरीब, जरूरतमंद और भिक्षा मांगने वालों को सीधे तौर पर दिया जाता है। वहीं, गैर-धार्मिक संगठनों (NGOs) तक इस दान का केवल 14.9% हिस्सा ही पहुंच पाता है।
रिपोर्ट लॉन्च के अवसर पर, सीएसआईपी की डायरेक्टर और हेड जिनी उप्पल ने कहा:
“हाउ इंडिया गिव्स 2025-26 की रिपोर्ट भारत की उस उदारता को सामने लाती है, जो हमेशा से रही है, पर कम आंकी गई। राष्ट्रीय खपत आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण करने से यह समझ आता है कि भारत कैसे दान देता है और देश के विकास के साथ दान करने के तरीकों में कैसे बदलाव आता है।”
नकद से ज्यादा सामान का दान
भारतीयों के दान करने का तरीका भी काफी अनूठा है। रिपोर्ट बताती है कि दान सिर्फ नकदी तक सीमित नहीं है।
- सामान के रूप में मदद: 48% (खाना, कपड़े, जरूरी वस्तुएं)
- नकद दान: 44%
- समय देकर सेवा (वॉलंटियरिंग): 30%
यह पैटर्न दिखाता है कि भारत में दान का स्वरूप काफी हद तक समुदाय-आधारित और व्यक्तिगत संबंधों पर टिका है। लोग सिर्फ पैसा देने के बजाय सीधे तौर पर मदद करने में विश्वास रखते हैं।
दान के पीछे की मुख्य वजह
रिपोर्ट के अनुसार, 90% से ज्यादा लोग दान को अपना धार्मिक कर्तव्य मानते हैं। इसके अलावा नैतिक जिम्मेदारी और किसी की सीधी अपील भी दान देने के लिए सबसे असरदार वजहें हैं। खास बात यह है कि दान देने की यह प्रवृत्ति हर आय वर्ग में देखी गई है। महीने में 4000-5000 रुपये कमाने वाले लगभग आधे परिवार भी दान करते हैं, जबकि ऊंची आय वाले परिवारों में यह भागीदारी 70 से 80% तक पहुंच जाती है।





