
केंद्र सरकार ने गुरुवार को राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुनवाई के तीसरे दिन कहा कि हर समस्या का समाधान सुप्रीम कोर्ट से नहीं हो सकता। कुछ मुद्दों को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के बीच बातचीत से हल किया जाना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से तर्क दिया कि यदि कुछ राज्यपाल विधेयकों पर देरी कर रहे हैं, तो इसका राजनीतिक समाधान प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि न्यायिक हस्तक्षेप।
मेहता का बयान सुप्रीम कोर्ट के उस सवाल के जवाब में आया, जिसमें पूछा गया था कि यदि कोई राज्यपाल लंबे समय तक विधेयक पर निर्णय नहीं लेता तो राज्य सरकारों के पास क्या विकल्प हैं। मेहता ने कहा, “यदि कोई राज्यपाल विधेयकों पर अटका रहा है तो राजनीतिक समाधान मौजूद हैं। मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से मिलकर या राष्ट्रपति से अनुरोध कर सकता है। कई बार प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल से बात करने के लिए कहते हैं और यह मुद्दा फोन पर भी हल हो सकता है।”
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अप्रैल के फैसले पर सलाह
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की ओर से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अप्रैल के फैसले पर सलाह देने के दौरान आई, जिसमें राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी के लिए 30 दिनों की समय सीमा तय की गई थी। गैर-भाजपा शासित राज्यों जैसे तमिलनाडु, केरल और पंजाब ने आरोप लगाया है कि केंद्र की ओर से नियुक्त राज्यपाल जानबूझकर विधेयकों को मंजूरी देने में देरी करते हैं या उन्हें राष्ट्रपति को भेज देते हैं।
राज्यपाल के कार्यों को मनमाना बताया
अप्रैल में तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि और वहां की सत्तारूढ़ डीएमके के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के कार्यों को मनमाना और गैरकानूनी करार दिया था। कोर्ट ने कहा था कि दूसरी बार विधानसभा से पारित विधेयकों को राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा 30 दिनों के भीतर मंजूरी देनी होगी। इस फैसले को राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत चुनौती दी है, जो उन्हें महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर कोर्ट की राय लेने का अधिकार देता है।
