छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जो अपनी संस्कृति और परंपराओं की वजह से देश भर में प्रसिद्ध है। आज यानी 3 जनवरी को इस राज्य कामशहूर लोक पर्व छेरछेरा भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। हर साल पौष माह की पूर्णिमा के दिन इसे मनाया जाता है। इस बार भी इसका जमकर उल्लास देखने का मिल रहा है।
भारत में जितने भी त्यौहार मनाया जाते हैं। उनके पीछे कोई ना कोई ऐतिहासिक कहानी या ठोस कारण जरूर होता है। यह हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का काम करते हैं। छेरछरा भी एक ऐसा ही पर्व है जिसे पीढ़ियों से मनाया जा रहा है। चलिए आज हम आपको छत्तीसगढ़ की इस परंपरा के बारे में बताते हैं।
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क्यों मनाया जाता है छेरछरा
लोकमान्यताओं के मुताबिक यह त्यौहार नई फसल की कटाई की खुशी में मनाया जाता है। किसान धान की फसल के लिए लगभग 2 महीने तक कड़ी मेहनत करते हैं। इसके बाद इसकी कटाई कर घर लाया जाता है। इसी खुशी को जाहिर करने के लिए यह त्यौहार मनाया जाता है।
पर्व के पीछे की मान्यता
परंपराओं के मुताबिक इस दिन युवा और बच्चों की टोलियां टोकरी या झोला लेकर सुबह-सुबह घर-घर जाते हैं और लोकगीत गाते हुए अनाज का दान मांगते हैं। लोग उन्हें अपनी क्षमता के मुताबिक चावल, अनाज या फिर पैसे देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस दान को देवी शाकंभरी को चढ़ाया जाता है, जिन्हें अनाज और सब्जियों की देवी कहा गया है। ऐसा कहते हैं कि इस दिन दान करने से पूरे साल घर में अन्न और धन की कमी नहीं होती।
सामाजिक समरसता का उदाहरण
यह पर्व केवल धार्मिक रूप से ही प्रसिद्ध नहीं है बल्कि सामाजिक समरसता का सुंदर उदाहरण भी देता है। इस दिन जातिगत भेदभाव और ऊँच-नीच को भूलकर लोग एक दूसरे के दरवाजे पर पहुंचकर खुशियां बांटते हैं। ये त्योहार छत्तीसगढ़ के लोगों के मन में अपनी मिट्टी और फसलों के प्रति सम्मान भी उजागर करता है।