नई दिल्ली: दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और उससे जुड़े कॉलेजों में किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन, रैली या जुलूस पर पूरी तरह से रोक लगाने के आदेश पर दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को सख्त टिप्पणी की। चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने इस तरह के पूर्ण प्रतिबंध को प्रथम दृष्टया गलत ठहराते हुए दिल्ली पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब तलब किया है।
कोर्ट ने सवाल उठाया कि कानून-व्यवस्था का उल्लंघन होने पर पुलिस कार्रवाई कर सकती है, लेकिन क्या शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को भी पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जा सकता है? हालांकि, अदालत ने इस प्रतिबंध पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया और दोनों पक्षों को एक सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
ये भी पढ़ें
क्या था पूरा मामला?
यह मामला डीयू के विधि संकाय के छात्र उदय भदौरिया की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। भदौरिया ने प्रॉक्टर ऑफिस के 17 फरवरी के उस नोटिफिकेशन को चुनौती दी है, जिसमें कैंपस और कॉलेजों में सार्वजनिक सभा, जुलूस, धरना-प्रदर्शन और पांच या उससे अधिक लोगों के शांतिपूर्ण जमावड़े पर भी रोक लगा दी गई थी। यह फैसला UGC की इक्विटी गाइडलाइंस को लेकर हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई झड़पों के बाद लिया गया था।
इसके बाद, किरोड़ीमल कॉलेज और दयाल सिंह कॉलेज जैसे संस्थानों ने भी एडवाइजरी जारी कर निलंबन और नौकरी से निकालने जैसी अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी थी। छात्रों और स्टाफ को सोशल मीडिया पर इससे जुड़ा कंटेंट शेयर करने से भी मना किया गया था।
“हमारी साफ राय है कि पूरी तरह बैन नहीं लगाया जा सकता… अगर किसी ने (धारा) 144 (CrPC) का उल्लंघन किया था, तो पुलिस को एक्शन लेना चाहिए था। आपने यह ऑर्डर क्यों जारी किया? कृपया मुझे बताएं कि आपको यह ऑर्डर जारी करने की क्या जरूरत थी?”- चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय
कोर्ट ने छात्रों के व्यवहार पर भी उठाए सवाल
हालांकि, कोर्ट ने छात्रों के आचरण पर भी टिप्पणी की। बेंच ने कहा कि वह इस मामले में सिर्फ इसलिए दखल दे रही है क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 19 (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा, “इस आज़ादी का गलत इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। आपको (छात्रों को) ठीक से पेश आना चाहिए। ऐसी हालत क्यों हुई? प्रॉक्टर भी एक शिक्षाविद हैं। वह ऐसा आदेश क्यों देंगे? कोई भी शिक्षाविद ऐसा आदेश नहीं देना चाहता, लेकिन जिस तरह से आप पेश आ रहे हैं… देखिए (DUSU) चुनावों के दौरान क्या हुआ था।”
25 मार्च को अगली सुनवाई
दिल्ली पुलिस के वकील ने अदालत को बताया कि विरोध प्रदर्शनों पर रोक के आदेश को अप्रैल तक बढ़ा दिया गया है। याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में कहा कि यह पूर्ण प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन है और यह अकादमिक संवाद पर बुरा असर डालता है। कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई के लिए 25 मार्च की तारीख तय की है।