भारत अपने शिक्षा तंत्र को वैश्विक साझेदारी के अगले चरण में ले जाने की कोशिश कर रहा है। इसी दिशा में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्टडी इन इंडिया एडु-डिप्लोमैटिक कॉन्क्लेव में 50 से ज्यादा देशों के महानुभावों, हाई कमिश्नरों और राजनयिकों को संबोधित करते हुए भारतीय उच्च शिक्षा के बदलते ढांचे पर जोर दिया।
मंत्री ने कार्यक्रम की जानकारी सोशल मीडिया पर साझा की और कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बाद शिक्षा व्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन तेज हुए हैं। उनके मुताबिक, भारत ने शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है और अब ध्यान केवल पहुंच बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि क्वालिटी, इनोवेशन और अफोर्डेबिलिटी को साथ लेकर आगे बढ़ने पर है।
“अनिश्चितता और तेजी से बदलाव वाली दुनिया में, शिक्षा समाजों के बीच सबसे मजबूत पुल बनी हुई है। भारत दूसरे देशों के साथ ज्ञान का पुल बनाना चाहता है।”- धर्मेंद्र प्रधान
संबोधन के दौरान प्रधान ने स्पष्ट किया कि भारत अपने शिक्षा मॉडल को सहयोग-आधारित ढांचे में देखता है। उन्होंने उपस्थित प्रतिनिधियों से कहा कि भारत के तेजी से बढ़ते, इनोवेशन-ड्रिवन, मल्टी-डिसिप्लिनरी और एक्सेस-फ्रेंडली एजुकेशन सिस्टम के साथ साझेदारी के अवसरों को व्यापक रूप से देखा जाना चाहिए।
NEP 2020 के बाद क्या बदला
प्रधान के वक्तव्य का केंद्रीय बिंदु NEP 2020 रहा। उन्होंने कहा कि नीति ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को अधिक लचीला, बहुविषयक और वैश्विक जरूरतों के अनुरूप बनाने में दिशा दी है। इसी बदलाव के साथ स्टडी इन इंडिया पहल को भी आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि भारत सिर्फ घरेलू छात्रों का केंद्र न रहकर अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और संस्थानों के लिए भी एक भरोसेमंद गंतव्य बने।
यह भी रेखांकित किया गया कि शिक्षा में सुधार को भारत आर्थिक और रणनीतिक क्षमता से जोड़कर देख रहा है। मंत्री के अनुसार, वैश्विक माहौल में भारत की भूमिका इसलिए अलग दिख रही है क्योंकि यहां सीखने, रिसर्च, इनोवेशन और समाधान लागू करने के लिए एक साथ अवसर उपलब्ध हैं।
2047 का लक्ष्य और वैश्विक संदर्भ
प्रधान ने कहा कि भारत ने 2047, यानी आजादी के 100 वर्ष पूरे होने तक, विकसित देश बनने का लक्ष्य रखा है। इस संदर्भ में शिक्षा को बुनियादी आधार के रूप में पेश किया गया। उनके अनुसार, भारत की तीन प्रमुख ताकतें-वाइब्रेंट नॉलेज इकोसिस्टम, डेमोग्राफिक डिविडेंड और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था-आने वाले वर्षों में शिक्षा एवं शोध सहयोग को नई दिशा दे सकती हैं।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वैश्विक साझेदारी केवल छात्र आदान-प्रदान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। रिसर्च को-क्रिएशन, संस्थागत सहयोग, क्षमता निर्माण और ज्ञान साझा करने जैसे आयामों को भी समान महत्व देने की जरूरत है।
AI से सेमीकंडक्टर तक सहयोग का एजेंडा
मंत्री ने तकनीकी क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि AI, बायोटेक, सेमीकंडक्टर और सस्टेनेबल एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भारत एक विश्वसनीय इनोवेशन पार्टनर के रूप में उभर रहा है। उन्होंने इसे ग्लोबल साउथ के लिए सहयोग पर आधारित मॉडल से जोड़ा, जिसमें प्रतिस्पर्धा से अधिक प्राथमिकता साझा क्षमताओं और साझा ज्ञान को दी जाती है।
कार्यक्रम का समग्र संदेश यह रहा कि भारत शिक्षा कूटनीति को व्यापक रणनीति की तरह देख रहा है-जहां अकादमिक नेटवर्क, रिसर्च इकोसिस्टम और नीति-स्तरीय सहयोग मिलकर दीर्घकालिक साझेदारी तैयार करें। प्रधान का आग्रह था कि मौजूद देश भारत के साथ इस दौर में ठोस संस्थागत सहभागिता बढ़ाएं, ताकि शिक्षा के जरिए बहुपक्षीय संबंधों को स्थायी आधार मिल सके।





