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FTA, CEPA से TEPA तक, भारत के व्यापारिक समझौतों का क्या है मतलब? UAE, ऑस्ट्रेलिया समेत 8 देशों से हुए हैं करार

Written by:Banshika Sharma
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भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी वैश्विक व्यापार नीति को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाया है। यूएई, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ जैसे कई देशों के साथ हुए इन समझौतों को CEPA, ECTA, TEPA जैसे अलग-अलग नाम दिए गए हैं। जानिए इन सभी में क्या बुनियादी अंतर है और इनका उद्देश्य क्या है।
FTA, CEPA से TEPA तक, भारत के व्यापारिक समझौतों का क्या है मतलब? UAE, ऑस्ट्रेलिया समेत 8 देशों से हुए हैं करार

नई दिल्ली। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक व्यापार के मैदान में अपनी रणनीति को एक नई दिशा दी है। 2021 से अब तक देश ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ (EU) और ब्रिटेन (UK) समेत कई देशों और आर्थिक समूहों के साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इन समझौतों का मुख्य लक्ष्य भारतीय निर्यात को बढ़ावा देना, विदेशी निवेश को आकर्षित करना और घरेलू उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक आसान पहुंच प्रदान करना है।

अक्सर इन समझौतों के अलग-अलग नाम जैसे- FTA, CEPA, ECTA और TEPA लोगों के बीच भ्रम पैदा करते हैं। हालांकि ये सभी व्यापार को सुगम बनाने से जुड़े हैं, लेकिन इनके उद्देश्य और दायरे में काफी अंतर होता है। आइए समझते हैं कि इन समझौतों का असल मतलब क्या है और ये एक-दूसरे से कितने अलग हैं।

FTA और CEPA: सबसे आम समझौते

फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA): यह सबसे बुनियादी व्यापार समझौता है। इसका मुख्य उद्देश्य दो या दो से अधिक देशों के बीच आयात और निर्यात होने वाले सामानों पर लगने वाले टैक्स (टैरिफ) को कम करना या पूरी तरह खत्म करना होता है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार सस्ता और आसान हो जाता है, जिसका सीधा लाभ निर्यातकों और उपभोक्ताओं को मिलता है।

कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA): यह समझौता FTA से कहीं ज्यादा व्यापक होता है। इसमें सिर्फ वस्तुओं के व्यापार पर ही नहीं, बल्कि सेवाओं (Services), निवेश (Investment), बौद्धिक संपदा अधिकार और आर्थिक सहयोग के अन्य क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया जाता है। CEPA के तहत कंपनियां दूसरे देश में आसानी से निवेश कर सकती हैं और अपनी सेवाएं दे सकती हैं।

ECTA, CETA और TEPA के विशेष उद्देश्य

इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड ट्रेड एग्रीमेंट (ECTA): यह अक्सर एक शुरुआती या अंतरिम समझौता होता है। जब दो देश जल्द से जल्द व्यापारिक लाभ लेना चाहते हैं, तो वे पहले ECTA पर हस्ताक्षर करते हैं। इसमें कुछ सीमित वस्तुओं और सेवाओं को शामिल किया जाता है। बाद में बातचीत के जरिए इसे एक पूर्ण CEPA या FTA में बदल दिया जाता है, जैसा भारत और ऑस्ट्रेलिया के मामले में हुआ।

कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA): यह एक बहुत बड़ा और विस्तृत समझौता होता है, जो आमतौर पर बड़ी अर्थव्यवस्थाओं या आर्थिक समूहों के बीच किया जाता है। इसमें व्यापार, निवेश, टैरिफ के अलावा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, सरकारी खरीद और औद्योगिक मानकों जैसे कई जटिल विषय शामिल होते हैं।

ट्रेड एंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (TEPA): इस समझौते का मुख्य फोकस व्यापार से ज्यादा निवेश और आर्थिक साझेदारी पर होता है। TEPA के जरिए देश में विदेशी निवेश, नए उद्योग लगाने, रोजगार पैदा करने और तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जाता है। इसका लक्ष्य लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होता है।

एक नजर में समझें सभी समझौतों में अंतर

FTA: मुख्य रूप से वस्तुओं पर टैक्स कम करना।

CEPA: वस्तु, सेवा, निवेश समेत व्यापक आर्थिक साझेदारी।

ECTA: सीमित दायरे वाला शुरुआती समझौता।

CETA: बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच बेहद विस्तृत समझौता।

TEPA: व्यापार से ज्यादा निवेश और तकनीकी सहयोग पर जोर।

भारत द्वारा हाल में किए गए प्रमुख व्यापार समझौते

भारत सरकार ने वैश्विक बाजार में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में कई अहम समझौते किए हैं।

मॉरीशस (2021): भारत ने अफ्रीका में किसी देश के साथ अपना पहला CECPA (कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड पार्टनरशिप एग्रीमेंट) साइन किया।

संयुक्त अरब अमीरात-UAE (2022): एक ऐतिहासिक CEPA पर हस्ताक्षर हुए, जिससे भारतीय निर्यातकों को खाड़ी बाजार में बड़ी पहुंच मिली।

ऑस्ट्रेलिया (2022): भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच ECTA लागू हुआ, जिसे आगे चलकर CEPA में बदलने की योजना है।

EFTA देश (2024-25): स्विट्जरलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और लिकटेंस्टीन के समूह EFTA के साथ भारत ने TEPA पर हस्ताक्षर किए, जिसका लक्ष्य 100 अरब डॉलर का निवेश आकर्षित करना है।

अन्य प्रमुख समझौते: भारत की ब्रिटेन के साथ CETA, ओमान के साथ CEPA, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ FTA पर बातचीत अंतिम चरणों में है, जिनके जल्द ही लागू होने की उम्मीद है। इन कदमों से भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक मंच पर नई मजबूती मिलने की संभावना है।