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हिंदी पत्रकारिता दिवस: भाषा, सामाजिक चेतना और जनजागरण की साझी विरासत, जानिए इस दिन का इतिहास और महत्व

Written by:Shruty Kushwaha
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आज का दिन पत्रकारिता, खासकर हिंदी पत्रकारिता के महत्व, उसकी निष्पक्षता और निडरता को रेखांकित करने का अवसर भी है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है जो समाज को सूचित, जागरूक और सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हिंदी पत्रकारिता ने न सिर्फ भाषा और संस्कृति को समृद्ध किया है, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक भारत तक राष्ट्र निर्माण में भी अहम योगदान दिया है।
हिंदी पत्रकारिता दिवस: भाषा, सामाजिक चेतना और जनजागरण की साझी विरासत, जानिए इस दिन का इतिहास और महत्व

आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है। हर साल ये दिन 30 मई को मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन हिंदी भाषा का पहला समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन शुरू हुआ था। यह दिन न सिर्फ हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक शुरुआत का प्रतीक है, बल्कि यह लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका, स्वतंत्रता और जिम्मेदारी की याद भी दिलाता है। आज का दिन हिंदी पत्रकारिता के योगदान को याद करने और इसे प्रोत्साहन देने के लिए मनाया जाता है।

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। ये जनता और सरकार के बीच पुल का काम करती है। जैसे किसी इमारत को चार मजबूत खंभों की ज़रूरत होती है, वैसे ही एक मज़बूत लोकतंत्र को भी चार स्तंभों की जरूरत होती है। हमारे यहां विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता को चार स्तंभ माना गया है।

हिंदी पत्रकारिता दिवस का इतिहास

हिंदी पत्रकारिता का उद्भव 30 मई 1826 को हुआ जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने ‘उदन्त मार्तण्ड’ का पहला अंक प्रकाशित किया। यह अखबार ब्रिटिश शासन के दौरान कोलकाता के बड़ा बाजार इलाके, अमर तल्ला लेन, कोलूटोला से प्रकाशित होता था और हर मंगलवार को पाठकों तक पहुंचता था। पंडित जुगल किशोर शुक्ल पेशे से वकील थे और मूल रूप से कानपुर के रहने वाले थे। उन्होंने इस अखबार के माध्यम से हिंदी भाषी पाठकों को उनकी भाषा में समाचार उपलब्ध कराने का बीड़ा उठाया। उस समय भारत में अंग्रेजी, बांग्ला, फारसी और उर्दू में कई समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे थे, लेकिन हिंदी में कोई अखबार नहीं था। ‘उदन्त मार्तण्ड’ ने इस कमी को पूरा करने का प्रयास किया।

‘उदन्त मार्तण्ड’ ने की हिंदी पत्रकारिता के नए युग की शुरुआत 

हालांकि, इस अखबार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कोलकाता में हिंदी भाषी पाठकों की कमी और डाक शुल्क की ऊंची दरों के कारण इसे हिंदी भाषी राज्यों में भेजना आर्थिक रूप से कठिन था। ब्रिटिश सरकार ने डाक दरों में छूट देने से इनकार कर दिया और सरकारी विभागों ने इसकी एक भी प्रति खरीदने में रुचि नहीं दिखाई आर्थिक तंगी के कारण 79 अंकों के बाद 4 दिसंबर 1827 को इसका प्रकाशन बंद हो गया। लेकिन इसने हिंदीभाषी समाज के लिए पत्रकारिता के एक नए युग की शुरुआत कर दी। बाद में हिंदी पत्रकारिता ने कई सोपान तय किए। भारतेन्दु हरिश्चंद्र जैसे पत्रकारों ने ‘कविवचन सुधा’ (1867) और ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ (1873) जैसे प्रकाशनों के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी। गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1913 में ‘प्रताप’ अखबार शुरू किया..जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हिंदी पत्रकारिता दिवस का महत्व और उद्देश्य

हिंदी पत्रकारिता ने उन लोगों तक समाचार पहुंचाए जो अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में सहज नहीं थे। हिंदी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन में जनता को जागरूक करने और राष्ट्रीय चेतना को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उदाहरण के लिए ‘उदन्त मार्तण्ड’ और बाद में ‘प्रताप’ जैसे अखबारों ने ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई। साथ ही सामाजिक कुरीतियों जैसे बाल विवाह, अशिक्षा और जातिगत भेदभाव के खिलाफ भी जागरूकता फैलाई। इस दिन को मनाने का उद्देश्य हिंदी भाषा में समाचार और सूचनाओं के प्रसार को बढ़ावा देना है। आज का दिन उन पत्रकारों के योगदान को पहचानने और सम्मानित करने का है जो जो समाज को जागरूक करने और सटीक जानकारी प्रदान करने के लिए अथक प्रयास करते हैं।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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