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कैश कांड में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा पर लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव मंजूर, स्पीकर ने बनाई जांच कमेटी

Written by:Vijay Choudhary
Published:
समिति महाभियोग प्रस्ताव से जुड़े सभी आरोपों की जांच करेगी और अपनी विस्तृत रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर को सौंपेगी। इसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
कैश कांड में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा पर लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव मंजूर, स्पीकर ने बनाई जांच कमेटी

जस्टिस यशवंत वर्मा

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया आधिकारिक रूप से शुरू हो गई है। मंगलवार, 12 अगस्त को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यह कदम कैश कांड से जुड़े मामले में उठाया गया है, जिसमें जस्टिस वर्मा पर गंभीर आरोप लगे हैं। प्रस्ताव पर कुल 146 सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जिनमें सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के नेता शामिल हैं। स्पीकर ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन भी कर दिया है। समिति की रिपोर्ट आने तक महाभियोग प्रस्ताव लंबित रहेगा।

कमेटी में होंगे न्यायिक और कानूनी विशेषज्ञ

लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित जांच समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बीबी आचार्य को शामिल किया गया है। यह समिति महाभियोग प्रस्ताव से जुड़े सभी आरोपों की जांच करेगी और अपनी विस्तृत रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर को सौंपेगी। इसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।

कैश कांड कैसे आया सामने

14 मार्च 2024 को दिल्ली में स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में अचानक आग लग गई। उस समय वे दिल्ली हाईकोर्ट में कार्यरत थे। सूचना मिलते ही दिल्ली फायर सर्विस की टीम मौके पर पहुंची और आग पर काबू पा लिया। लेकिन आग बुझने के बाद जो दृश्य सामने आया, उसने सभी को चौंका दिया, स्टोर रूम से बोरे में भरे 500-500 रुपए के जले हुए नोटों के बंडल बरामद हुए। यह बरामदगी कैश कांड का केंद्र बिंदु बन गई और जस्टिस वर्मा पर सवालों की बौछार होने लगी। जस्टिस वर्मा ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनके घर या स्टोर में कोई नकदी नहीं थी और यह पूरी तरह उन्हें फंसाने की साजिश है। घटना के कुछ दिनों बाद, 28 मार्च को उनका ट्रांसफर इलाहाबाद हाईकोर्ट में कर दिया गया।

महाभियोग प्रक्रिया क्या होती है

भारत में किसी भी सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जज को उनके पद से हटाने के लिए महाभियोग ही एकमात्र संवैधानिक प्रक्रिया है। यह प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है। इनमें लोकसभा या राज्यसभा दोनों हो सकता है। इस प्रक्रिया के तहत प्रस्ताव को सदन के अध्यक्ष (स्पीकर) या सभापति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। पर्याप्त संख्या में सांसदों के समर्थन और हस्ताक्षर मिलने के बाद, एक जांच समिति का गठन किया जाता है। समिति में सुप्रीम कोर्ट का एक जज, संबंधित हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश या जज, और एक विशिष्ट विधि विशेषज्ञ शामिल होते हैं। समिति की रिपोर्ट में आरोप सही पाए जाने पर, सदन में मतदान कराया जाता है।

दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होने पर, राष्ट्रपति द्वारा जज को पद से हटाया जाता है। जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में अब पूरी प्रक्रिया इस समिति की रिपोर्ट पर निर्भर करेगी। रिपोर्ट आने से पहले उन्हें दोषी या निर्दोष करार नहीं दिया जाएगा।