ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना पर बढ़ते विवाद के बीच, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को एक विस्तृत पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने परियोजना को मिली पर्यावरणीय मंजूरियों, आदिवासी अधिकारों के उल्लंघन और रणनीतिक औचित्य पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जयराम रमेश ने केंद्रीय पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्री और केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री को पूर्व में पत्र लिखने के बाद अब रक्षा मंत्री से भी इस विषय पर हस्तक्षेप का आग्रह किया है।
जयराम रमेश के अनुसार, परियोजना को मिली पर्यावरणीय मंजूरियां बेहद संदिग्ध आधारों पर दी गई हैं। इन मंजूरियों को लेकर जारी ‘अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न’ पूरी तरह भ्रामक तस्वीर पेश करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मंजूरी प्रक्रिया वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों का पालन करने की स्थिति को भी गलत तरीके से प्रस्तुत करती है। कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया है कि यह प्रक्रिया संसद द्वारा आदिवासी समुदायों को दिए गए व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों का भावना और शब्द दोनों स्तरों पर खुला उल्लंघन करती है। यह स्थिति परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
जयराम रमेश ने परियोजना के वाणिज्यिक स्वरूप पर उठाए सवाल
अपने पत्र में जयराम रमेश ने परियोजना के वाणिज्यिक स्वरूप पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह परियोजना मूल रूप से एक वाणिज्यिक उद्यम है और इसके कारण होने वाले पारिस्थितिकीय नुकसान को लेकर सार्वजनिक आलोचना का सामना कर रही है। सरकार इसे तथाकथित रूप से सर्वोपरि सुरक्षा कारणों के आधार पर उचित ठहराने की कोशिश कर रही है। जयराम रमेश ने यह स्वीकार किया कि देश की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की आवश्यकता पर कोई दो राय नहीं हो सकती, और भारत की रणनीतिक क्षमताओं को विश्वसनीय तरीके से प्रदर्शित करने की जरूरत पर भी कोई मतभेद नहीं है। हालांकि, उन्होंने इस परियोजना के वास्तविक रणनीतिक लाभों पर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस नेता ने वैकल्पिक रक्षा विकल्पों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि ग्रेट निकोबार द्वीप के कैंपबेल वे में स्थित ‘आईएनएस बाज’ को जुलाई 2012 में कमीशन किया गया था। मौजूदा रनवे की लंबाई को कम से कम तीन गुना बढ़ाने और एक नौसैनिक जेट्टी बनाने की योजनाएं लगभग पांच वर्षों से मंजूरी का इंतजार कर रही हैं। इन योजनाओं का पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव भी काफी कम होगा, ऐसा जयराम रमेश ने दावा किया। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इन विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, जो वर्तमान परियोजना की तुलना में अधिक व्यवहार्य और कम विनाशकारी हैं।
ग्रेट निकोबार परियोजना के ट्रांसशिपमेंट पोर्ट पर सवाल
उन्होंने आगे कहा कि अंडमान एवं निकोबार कमांड की ऐसी कई संपत्तियां हैं, जो कई वर्ष पहले (2014 से भी काफी पहले) बनाई गई थीं। इन संपत्तियों का विस्तार कहीं कम पर्यावरणीय तबाही के साथ किया जा सकता है। इनमें आईएनएस कार्डिप, आईएनएस कोहासा, आईएनएस उत्क्रोश, आईएनएस जरावा और कार निकोबार एयरफोर्स स्टेशन शामिल हैं। जयराम रमेश ने जोर देकर कहा कि ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ट्रांसशिपमेंट पोर्ट और टाउनशिप हैं। उनका तर्क है कि इन सुविधाओं से हमारे देश की सैन्य क्षमता किसी भी तरह से नहीं बढ़ती है। फिर भी, अब अचानक इन्हें सही ठहराने के लिए यही एक बड़ा आधार बनाकर पेश किया जा रहा है।
जयराम रमेश ने अपनी बात दोहराते हुए कहा कि ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना अपने मौजूदा स्वरूप में पारिस्थितिकीय तबाही का नुस्खा है। उन्होंने रक्षा मंत्री से आग्रह किया कि वे ऊपर बताए गए उन विकल्पों पर गंभीरता से विचार करें, जिन्हें स्वयं प्रतिष्ठित नौसेना अधिकारियों ने अपनी लेखनी में सुझाया है। यह पत्र परियोजना के भविष्य और इसके पर्यावरणीय, सामाजिक तथा रणनीतिक प्रभावों को लेकर बहस को और तेज कर सकता है।





