ग्रेट निकोबार डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को लेकर अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य जयराम रमेश ने केंद्र सरकार और पर्यावरण मंत्रालय पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री को एक विस्तृत पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने कहा कि सरकार जिस मजबूत और व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) का दावा कर रही है, वह किसी भी दस्तावेज या रिपोर्ट में कहीं दिखाई नहीं देता। इसी के साथ जयराम रमेश ने यह भी आरोप लगाया है कि इस परियोजना के लिए किए गए सभी पर्यावरणीय अध्ययन बेहद सीमित, अधूरे और वैज्ञानिक मानकों के बिल्कुल खिलाफ हैं।
अपने पत्र में जयराम रमेश ने उल्लेख किया कि 1 मई को सरकार ने ‘ग्रेट निकोबार परियोजना: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न’ जारी किए थे। इसमें दावा किया गया था कि परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का व्यापक अध्ययन किया गया है और उन्हें प्रभावी तरीके से प्रबंधित भी किया जा रहा है। जयराम रमेश ने कहा कि उन्होंने 3 मई को इन प्रश्नों का जवाब दिया था, लेकिन अब वे कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखना चाहते हैं, जो इस परियोजना की सच्चाई को उजागर करते हैं।
उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार अंडमान-निकोबार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में बनने वाले बड़े पोर्ट प्रोजेक्ट्स के लिए व्यापक ईआईए कराना अनिवार्य होता है। इसके तहत कम से कम तीन मौसमों का विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए, ताकि पर्यावरण और जैव विविधता पर पड़ने वाले असर का सही आकलन हो सके। जयराम रमेश ने 3 नवंबर 2009 के पर्यावरण मंत्रालय के ऑफिस मेमोरेंडम का भी हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 50 लाख टन प्रति वर्ष से बड़े पोर्ट प्रोजेक्ट्स के लिए व्यापक ईआईए, गणितीय मॉडलिंग और जमीनी सत्यापन अनिवार्य है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में निर्धारित मानकों का पालन नहीं: जयराम रमेश
जयराम रमेश ने बताया कि मंत्रालय की क्षेत्र-विशिष्ट ईआईए नियमावली भी कम से कम दो मौसमों के भौतिक, रासायनिक और जैविक आधारभूत डेटा की मांग करती है। उन्होंने दावा किया कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में इन निर्धारित मानकों का पालन बिल्कुल नहीं किया गया। इसी के साथ उन्होंने यह भी बताया कि इसरो की 2021 की मैपिंग में गलाथिया बे के एक बड़े हिस्से को इरोजन जोन (कटाव क्षेत्र) बताया गया था। ऐसी स्थिति में, तटीय विनियमन क्षेत्र नियमों के तहत और भी ज्यादा विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता थी।
जयराम रमेश ने अपने दावों को पुष्ट करते हुए कहा कि ग्रेट निकोबार परियोजना की फाइनल ईआईए रिपोर्ट खुद यह स्वीकार करती है कि आधारभूत अध्ययन सिर्फ दिसंबर 2020 से फरवरी 2021 तक यानी केवल एक मौसम में ही किए गए थे। उन्होंने कहा कि परिस्थितिकी और जैव विविधता का ‘क्विक सर्वे’ सिर्फ 14 से 22 दिसंबर 2020 के बीच हुआ, जबकि लेदरबैक कछुओं का सर्वेक्षण तो केवल 12 से 18 फरवरी 2021 तक ही चला।
उन्होंने आगे कहा कि ईआईए रिपोर्ट में खुद यह माना गया है कि घने जंगलों की वजह से गहन सर्वेक्षण संभव नहीं हो सका और कई हिस्सों का अध्ययन बेहद सीमित रहा। रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया है कि जंगलों में जो अभी तक सामने नहीं आया, वह और ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। जयराम रमेश ने भारतीय प्राणी सर्वेक्षण और भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि ये अध्ययन भी कुछ दिनों या हफ्तों तक सीमित ‘त्वरित मूल्यांकन’ ही थे। उन्होंने यह भी कहा कि एएनआईआईडीसीओ द्वारा जमा किए गए आवेदन पत्र में भी स्थलीय और समुद्री ईआईए अध्ययन की अवधि बेहद कम दिखाई गई है।
जयराम रमेश ने अधूरे अध्ययनों पर पर्यावरण मंजूरी को बताया ‘विज्ञान का अपमान’
उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इन अधूरे अध्ययनों के आधार पर पर्यावरण मंजूरी देना ‘विज्ञान का अपमान’ और ईआईए प्रक्रिया का सीधा-सीधा मजाक है। उन्होंने यह भी कहा कि वे अब तक सरकार द्वारा दावा किए गए ‘मजबूत ईआईए’ और ‘ईएमपी’ (पर्यावरण प्रबंधन योजना) को ढूंढ नहीं पाए हैं। जयराम रमेश ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के 3 अप्रैल 2023 के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें पर्यावरण मंजूरी में ‘अनुत्तरित कमियां’ की बात कही गई थी और एक उच्च-स्तरीय समिति (एचपीसी) गठित करने का निर्देश दिया गया था। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पूरी पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया सार्वजनिक थी, तो फिर एचपीसी रिपोर्ट को गोपनीय क्यों रखा गया है।
जयराम रमेश ने कहा कि सरकार का एचपीसी रिपोर्ट को गोपनीय बताना पारदर्शिता और जवाबदेही के बिल्कुल खिलाफ है। उन्होंने मांग की कि अच्छी शासन व्यवस्था और सार्वजनिक बहस के हित में इस रिपोर्ट को तत्काल सार्वजनिक किया जाए। पत्र में जयराम रमेश ने यह भी कहा कि ग्रेट निकोबार की जैव विविधता दुनिया में अनोखी है और यह परियोजना इस पूरे इकोसिस्टम को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। उन्होंने क्षतिपूरक वनीकरण के तर्क को ‘पूरी तरह गलत’ बताया और कहा कि कई सुरक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि देश की सुरक्षा जरूरतें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना भी पूरी की जा सकती हैं। उन्होंने सरकार से इस परियोजना के मौजूदा डिजाइन और स्वरूप पर दोबारा विचार करने की अपील की है।
Here is my latest letter to the Union Minister of Environment, Forests and Climate Change on the Great Nicobar Island Development Project pic.twitter.com/Has61V8PQB
— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh) May 10, 2026






