नई दिल्ली: लोकसभा अध्यक्ष ने सदन की एक महत्वपूर्ण समिति, विशेषाधिकार समिति का पुनर्गठन कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को इस 15 सदस्यीय समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। यह समिति संसद और इसके सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा करने का महत्वपूर्ण कार्य करती है।
नई समिति 3 मार्च से अपना कामकाज शुरू कर देगी। इस समिति का गठन ऐसे समय में हुआ है जब हाल ही में बजट सत्र के दौरान इसके न होने पर सवाल खड़े हुए थे। सरकार ने नेता विपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस देने की बात कही थी, जिसके बाद यह मुद्दा गरमा गया था।
समिति में शामिल हैं विभिन्न दलों के दिग्गज
लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित इस समिति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के अनुभवी सांसदों को शामिल किया गया है ताकि संतुलन बना रहे। समिति के 15 सदस्यों में विभिन्न राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है।
बीजेपी की ओर से रविशंकर प्रसाद के अलावा जगदंबिका पाल, बृजमोहन अग्रवाल, रामवीर सिंह बिधूड़ी, संगीता सिंह देव और त्रिवेंद्र सिंह रावत को सदस्य बनाया गया है। वहीं, कांग्रेस पार्टी से तारिक अनवर, मनीष तिवारी और मणिक्कम टैगोर को समिति में जगह दी गई है। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से कल्याण बनर्जी, डीएमके से टी आर बालू और समाजवादी पार्टी से धर्मेंद्र यादव भी इस समिति का हिस्सा होंगे।
क्यों महत्वपूर्ण है विशेषाधिकार समिति?
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद की गरिमा और उसके सदस्यों के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च होती है। विशेषाधिकार समिति इसी काम को सुनिश्चित करती है। इसका मुख्य कार्य संसद, उसकी समितियों और सदस्यों के विशेषाधिकारों के हनन से जुड़े मामलों की जांच करना है।
यह समिति एक अर्द्ध-न्यायिक निकाय की तरह काम करती है। अगर कोई व्यक्ति या संस्था किसी सांसद के काम में बाधा डालता है या सदन की अवमानना करता है, तो यह समिति मामले की जांच कर सकती है। जांच के बाद यह दोषी पाए जाने पर सजा की सिफारिश भी कर सकती है, जिसमें सदन में माफी मांगने से लेकर सदन से निलंबन तक की कार्रवाई शामिल हो सकती है। रविशंकर प्रसाद जैसे कानून के गहरे जानकार को अध्यक्ष बनाए जाने से उम्मीद है कि समिति सदन में अनुशासन और मर्यादा को और मजबूती प्रदान करेगी।
बजट सत्र में उठा था समिति के गठन का सवाल
बजट सत्र के पहले चरण के दौरान जब बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया था, तब यह सवाल उठा था कि जब समिति का गठन ही नहीं हुआ है तो नोटिस पर कार्रवाई कैसे होगी। इसी के बाद स्पीकर को सबस्टेंटिव मोशन का नोटिस दिया गया था। अब समिति के गठन के साथ ही ऐसे मामलों पर प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी।





