नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए, तृणमूल कांग्रेस (TMC) की अगुवाई में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। विपक्ष ने इस संबंध में एक प्रस्ताव नोटिस संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा, में जमा कराया है। इस नोटिस पर 190 विपक्षी सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जो CEC को हटाने के लिए संवैधानिक रूप से आवश्यक न्यूनतम संख्या से कहीं अधिक है।
विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सात सूत्रीय आरोप-पत्र तैयार किया है। इन आरोपों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) का पक्ष लेने, मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित करने और विपक्षी नेताओं के साथ दुर्व्यवहार करने जैसे गंभीर मुद्दे शामिल हैं। यह भारतीय इतिहास में पहली बार है जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए इस तरह का नोटिस दिया गया है।
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क्या हैं मुख्य आरोप?
सूत्रों के अनुसार, विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार पर मुख्य रूप से तीन बड़े आरोप लगाए हैं, जो उनके सात सूत्रीय आरोप-पत्र का आधार हैं:
- मतदाताओं के अधिकार का हनन: विपक्ष का दावा है कि CEC ने बड़े पैमाने पर लोगों को उनके वोट देने के अधिकार से वंचित किया है। विशेष रूप से मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) प्रक्रिया के दौरान धांधली का आरोप है, जिसका उद्देश्य कथित तौर पर सत्ताधारी दल को लाभ पहुंचाना था।
- पक्षपातपूर्ण रवैया: ज्ञानेश कुमार पर अपने पद पर रहते हुए भेदभावपूर्ण और पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप है। विपक्ष का कहना है कि उन्होंने कई मौकों पर चुनावी धोखाधड़ी की शिकायतों की जांच में जान-बूझकर रुकावटें पैदा कीं।
- दुर्व्यवहार और असंवैधानिक कार्य: आरोप है कि जब टीएमसी के नेता उनसे मिलने गए तो CEC ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया। इसके अलावा, बिहार में SIR प्रक्रिया को संभालने के तरीके और संविधान के प्रावधानों का पालन न करने का भी आरोप है।
क्या है CEC को हटाने की प्रक्रिया?
संविधान के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के समान ही होती है। यह एक जटिल और कठिन प्रक्रिया है, जिसके लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।
नियमों के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव वाले नोटिस पर लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने अनिवार्य हैं। विपक्ष ने 190 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ यह शर्त पूरी कर ली है।
प्रस्ताव को संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। यदि इसे सदन द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है, तो इसकी जांच के लिए एक समिति का गठन किया जाता है। प्रस्ताव को पारित करने के लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और सदन में उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है। विपक्ष दोनों सदनों में नोटिस देकर यह सुनिश्चित करना चाहता है कि जांच समिति में दोनों सदनों के सांसद शामिल हों।
यह कदम विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाता है। अगर यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो यह भारतीय लोकतंत्र और इसकी संस्थाओं के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण होगा।