तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत के कई हिस्सों में चार दिवसीय पोंगल उत्सव श्रद्धा, परंपरा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। मदुरै के अवनियापुरम में इस अवसर पर जल्लीकट्टू का आयोजन किया गया। जल्लीकट्टू तमिलनाडु का पारंपरिक खेल है जिसमें बैलों को काबू में किया जाता है। इसमें जिसमें विशेष रूप से पाले गए देसी बैलों को मैदान में छोड़ा जाता है और प्रतिभागी उन्हें को पकड़कर निर्धारित दूरी या समय तक नियंत्रण में रखने का प्रयास करते हैं। यह खेल साहस, संतुलन और कौशल की परीक्षा माना जाता है।
जल्लीकट्टू का आयोजन हर वर्ष पोंगल के तीसरे दिन मट्टू पोंगल पर होता है। चार दिवसीय पोंगल सूर्य देव को समर्पित फसल उत्सव है, जिसमें खेती में सहायक पशुओं—विशेषकर बैलों—के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। मट्टू पोंगल के दिन पशुओं को सजाया जाता है और जल्लीकट्टू जैसे आयोजन उनकी भूमिका के सम्मान का प्रतीक होते हैं।
पोंगल पर्व से जुड़ा जल्लीकट्टू का प्राचीन इतिहास
पोंगल पर्व और जल्लीकट्टू का प्राचीन संबंध है जो मुख्य रूप से तमिलनाडु की कृषि आधारित संस्कृति और परंपरा से जुड़ा हुआ है। पोंगल एक चार दिवसीय फसल कटाई उत्सव है जो यह सूर्य देव, प्रकृति और खेती के लिए कृतज्ञता व्यक्त करने का त्योहार है। पोंगल के चार दिनों में से तीसरा दिन विशेष रूप से ‘मट्टू पोंगल’ कहलाता है, जिसका अर्थ है “बैल का पोंगल”। इस दिन बैलों और गायों को समर्पित किया जाता है, क्योंकि वे कृषि में किसानों के मुख्य सहयोगी हैं। इस दिन बैलों को नहलाया जाता है, उनके सींगों को रंग-बिरंगे रंगों से सजाया जाता है, फूलों की मालाएं पहनाई जाती हैं, घंटियां बांधी जाती हैं और उनकी पूजा की जाती है। इसी दिन ‘जल्लीकट्टू’ का आयोजन भी होता है, जो बैलों के सम्मान और उनकी ताकत का जश्न मनाने का प्रतीक है।
ऐतिहासिक रूप से प्रचलन में रहा है जल्लीकट्टू
जल्लीकट्टू को पोंगल के उत्सव का अभिन्न अंग माना जाता है। खासकर मदुरै, तिरुचिरापल्ली, पुडुकोट्टाई और थंजावुर जैसे जिलों में इसका खासा प्रचलन है। अवनियापुरम, पालमेडु और अलंगानल्लूर जैसे स्थानों पर बड़े स्तर पर यह खेल होता है। जल्लीकट्टू का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। प्राचीन तमिल समुदायों में यह खेल प्रचलित था। ऐतिहासिक रूप से यह खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि समुदाय में साहस, ताकत और ग्राम्य युवाओं की वीरता दिखाने का मंच भी रहा है।
इस बार भी ज़ोर शोर से हो रहा है जल्लीकट्टू का आयोजन
इस बार भी पोंगल के दौरान दुरै जिले के अवनियापुरम में जल्लीकट्टू की पहली प्रमुख प्रतियोगिता शुरू हुई। यह तीन प्रमुख जल्लीकट्टू आयोजनों की शुरुआत है, जिसमें सैकड़ों सांड और हजारों दर्शकों ने उत्साह का माहौल बनाया। राज्य के वाणिज्यिक कर एवं पंजीकरण मंत्री पी. मूर्ति ने मदुरै जिला कलेक्टर प्रवीण कुमार की मौजूदगी में इस आयोजन का उद्घाटन किया।
इस तरह खेला जाता है जल्लीकट्टू
जल्लीकट्टू में विशेष रूप से पाले गए देसी नस्ल के सांडों को मैदान में उतारा जाता है। प्रतियोगिता से पहले पशु-चिकित्सकों की टीम द्वारा सभी सांडों की स्वास्थ्य जांच की जाती है। इसके बाद सांडों को पारंपरिक प्रवेश द्वार वाड़ी वासल से एक-एक कर छोड़ा जाता है। मैदान में पहले से पंजीकृत और चिकित्सकीय रूप से फिट पाए गए बुल टेमर्स खड़े रहते हैं, जो सांड के बाहर आते ही उसके कूबड़ को पकड़कर निर्धारित दूरी या समय तक उसे नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। नियमों के अनुसार, सांड के सींग, पूंछ या कान पकड़ना सख्त रूप से प्रतिबंधित है। सिर्फ कूबड़ को पकड़कर संतुलन और कौशल के साथ सांड को काबू में रखना ही मान्य माना जाता है। सफल टेमर्स को पुरस्कार दिए जाते हैं, जबकि जिन सांडों को कोई भी नियंत्रित नहीं कर पाता उन्हें भी विशेष सम्मान दिया जाता है, क्योंकि इसे उनकी शक्ति और श्रेष्ठ नस्ल का प्रतीक माना जाता है।
वर्तमान में में जल्लीकट्टू आयोजन सुरक्षा और पशु-कल्याण नियमों के तहत किया जाता है। मैदान में मेडिकल टीम, एम्बुलेंस, पशु-चिकित्सा इकाइयां और बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात रहता है। सुप्रीम कोर्ट और तमिलनाडु सरकार के दिशानिर्देशों के अनुसार किसी भी प्रकार की क्रूरता, नशीले पदार्थों या धारदार उपकरणों के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध है। नियमों के उल्लंघन पर आयोजकों और प्रतिभागियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है।





