ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और जगदगुरु रामभद्राचार्य के बीच विवाद गहराता जा रहा है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रामभद्राचार्य और सरकारी तंत्र पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि ज्योतिष पीठ को बदनाम करने के लिए एक सोची-समझी साजिश रची जा रही है और अब इसके लिए पॉक्सो एक्ट का दुरुपयोग किया जा रहा है।
यह विवाद तब और बढ़ गया जब आशुतोष ब्रह्मचारी नामक एक व्यक्ति ने 28 जनवरी को प्रयागराज की एक अदालत में शंकराचार्य के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत FIR दर्ज करने की मांग करते हुए एक आवेदन दिया। शंकराचार्य के पक्ष का कहना है कि यह उन्हें फंसाने की एक कोशिश है।
क्या है पूरा मामला?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के कार्यालय द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम तब शुरू हुआ जब उन्होंने गोमाता को ‘राष्ट्रमाता’ का सम्मान दिलाने और भारत को गोहत्या मुक्त बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को 40 दिन का समय दिया था। विज्ञप्ति में आरोप लगाया गया है कि इसी दौरान ‘सत्ता समर्थित तथाकथित धर्माचार्यों का एक गिरोह’ सक्रिय हो गया और उनके खिलाफ भ्रामक व मानहानिकारक खबरें फैलाई गईं।
“बदनाम करने की साजिश नाकाम हुई है तब पॉक्सो एक्ट का सहारा लिया जा रहा है।” — शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती
28 जनवरी को आशुतोष ब्रह्मचारी द्वारा पॉक्सो एक्ट में FIR के लिए आवेदन दिए जाने पर अदालत ने तत्काल कोई आदेश नहीं दिया, बल्कि पुलिस से इस मामले में रिपोर्ट तलब की। शंकराचार्य पक्ष ने इस बात का भी खंडन किया है कि उनके खिलाफ कोई FIR दर्ज हुई है या किसी अदालत ने उन्हें समन जारी किया है।
शंकराचार्य पक्ष का जवाबी कानूनी कदम
इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से झूठी सूचना फैलाने के आरोप में आशुतोष ब्रह्मचारी और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ ही कानूनी कार्रवाई की गई। उनके खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 22, 23 (झूठी सूचना देने) और भारतीय न्याय संहिता के तहत मानहानि एवं झूठे मुकदमे से संबंधित धाराओं में एक आवेदन दायर किया गया।
इस आवेदन को अदालत ने एक शिकायत मामले (कम्प्लैन्ट केस सीएमसी संख्या 125/2026) के रूप में पंजीकृत कर लिया है। साथ ही, अदालत ने दोनों अभियुक्तों—आशुतोष ब्रह्मचारी एवं अन्य—को 20 फरवरी तक उपस्थित होकर अपना जवाब देने के लिए समन भी जारी किया है। शंकराचार्य के पक्ष ने इसे ही ‘सत्य’ बताया है।





