
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि जिन कैदियों ने अपनी सजा की अवधि पूरी कर ली है, उन्हें तुरंत रिहा किया जाना चाहिए। जस्टिस बी.वी. नागरथना और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के गृह सचिवों को निर्देश दिया कि वे अपने जेलों की जांच करें और इस आदेश का पालन करें। यह फैसला नितीश कटारा हत्याकांड में दोषी सुखदेव यादव उर्फ पहलवान की रिहाई के लिए दायर याचिका पर पिछले महीने दिए गए आदेश को स्पष्ट करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई में पहलवान की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया था। पहलवान को 2002 में दिल्ली के व्यवसायी नितीश कटारा की हत्या के मामले में 20 साल की निश्चित अवधि की आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। यह सजा 9 मार्च को पूरी हो चुकी थी, लेकिन सजा समीक्षा बोर्ड ने उनके व्यवहार का हवाला देते हुए उनकी रिहाई की मांग को खारिज कर दिया था। इसके बाद पहलवान ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
आजीवन कारावास की सजा
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निश्चित अवधि की आजीवन कारावास की सजा (या कोई अन्य सजा, जो पूर्ण आजीवन कारावास नहीं है) पूरी करने के बाद कैदी को रिहा करने के लिए किसी आदेश की आवश्यकता नहीं है। सजा में छूट (रेमिशन) का आदेश केवल उन कैदियों के लिए जरूरी है, जिन्हें अपनी शेष जिंदगी जेल में बिताने की सजा सुनाई गई हो। कोर्ट ने दिल्ली सरकार के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि 20 साल की सजा पूरी होने के बाद पहलवान को रिहा न करना गलत है।
क्या था पूरा मामला
2002 में नितीश कटारा की हत्या के मामले में पहलवान के साथ-साथ विकास यादव और उनके चचेरे भाई विशाल को भी दोषी ठहराया गया था। विकास और विशाल को 25 साल की सजा बिना छूट के सुनाई गई थी। यह मामला उस समय सुर्खियों में आया था जब नितीश को 16 फरवरी, 2002 की रात एक शादी समारोह से अगवा कर हत्या कर दी गई थी। यह हत्या कथित तौर पर विकास यादव की बहन भारती यादव के साथ नितीश के कथित संबंधों के कारण हुई थी।
