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दिल्ली में विजय चौक पर ‘बीटिंग द रिट्रीट’ समारोह, मनमोहक धुनों के साथ 77वें गणतंत्र दिवस का हुआ समापन

Written by:Ankita Chourdia
Published:
राजधानी दिल्ली के विजय चौक पर 'बीटिंग द रिट्रीट' समारोह के साथ 77वें गणतंत्र दिवस समारोह का समापन हो गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में सेना के बैंड्स ने अपनी प्रस्तुति से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।
दिल्ली में विजय चौक पर ‘बीटिंग द रिट्रीट’ समारोह, मनमोहक धुनों के साथ 77वें गणतंत्र दिवस का हुआ समापन

नई दिल्ली के ऐतिहासिक विजय चौक पर सोमवार शाम को ‘बीटिंग द रिट्रीट’ समारोह का आयोजन किया गया। इसके साथ ही चार दिनों तक चले 77वें गणतंत्र दिवस समारोह का औपचारिक रूप से समापन हो गया। इस दौरान भारतीय सेना के तीनों अंगों के बैंड्स ने पारंपरिक और मनमोहक धुनें बजाकर समां बांध दिया।

इस भव्य समारोह की साक्षी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बनीं, जो सशस्त्र बलों की सर्वोच्च कमांडर हैं। उनके साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और कई अन्य केंद्रीय मंत्री भी मौजूद थे। सेनाओं की एकता, अनुशासन और गौरव के इस प्रतीक कार्यक्रम ने वहां मौजूद हर किसी को गौरवान्वित कर दिया।

क्या है ‘बीटिंग द रिट्रीट’?

यह समारोह हर साल गणतंत्र दिवस के तीन दिन बाद, यानी 29 जनवरी की शाम को आयोजित होता है। यह गणतंत्र दिवस के आयोजनों के आधिकारिक समापन का प्रतीक है। इसमें भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना के साथ-साथ दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के बैंड अपनी संगीतमय प्रस्तुति देते हैं।

सेना की बैरक वापसी का प्रतीक

‘बीटिंग द रिट्रीट’ सदियों पुरानी एक सैन्य परंपरा है। यह उस समय का प्रतीक है, जब सूर्यास्त के बाद सेनाएं युद्ध समाप्त कर अपने शिविरों में लौटती थीं। समारोह की शुरुआत राष्ट्रपति के आगमन और उन्हें राष्ट्रीय सलामी देने के साथ होती है, जिसके बाद राष्ट्रगान होता है।

इसके बाद तीनों सेनाओं के बैंड मिलकर मार्च करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। कार्यक्रम के अंत में ‘रिट्रीट’ का बिगुल बजता है और बैंड मास्टर राष्ट्रपति से बैंड वापस ले जाने की अनुमति मांगते हैं, जो समारोह के समापन का संकेत होता है।

भारत में कैसे हुई शुरुआत?

भारत में इस समारोह की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। यह पहली बार महारानी एलिजाबेथ और प्रिंस फिलिप की भारत यात्रा के दौरान आयोजित किया गया था। तब से यह एक वार्षिक परंपरा बन गई है, जो सशस्त्र बलों के शौर्य और बलिदान को एक संगीतमय श्रद्धांजलि है। भारत के अलावा ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका जैसे कई अन्य देशों में भी यह परंपरा निभाई जाती है।