केरलम में कांग्रेस के अनुभवी नेता वीडी सतीशन ने हाल ही में राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है, जिसके साथ ही उनका दशकों लंबा राजनीतिक सफर एक नए मुकाम पर पहुंचा है और राज्य की राजनीति में एक नए अध्याय का सूत्रपात हुआ है। यह समारोह तिरुवनंतपुरम के सेंट्रल स्टेडियम में आयोजित हुआ, जहां मुख्यमंत्री सतीशन के साथ कई अन्य विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ग्रहण की, जिनमें रमेश चेन्नीथाला, के. मुरलीधरन, सनी जोसेफ और पी. कुन्हालीकुट्टी जैसे प्रमुख नाम शामिल रहे। इस अवसर पर कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा भी उपस्थित रहकर समारोह का हिस्सा बनीं।
वीडी सतीशन, जिनका पूरा नाम वदस्सेरी दामोदरन सतीशन है, का जन्म 31 मई 1964 को केरलम के कोच्चि स्थित नेट्टूर में एक नायर परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम के. दामोदरा मेनन और माता का नाम वी. विलासिनी अम्मा है, और उनकी राजनीतिक जड़ें दिल्ली के सत्ता हलकों से दूर, शुरू से ही जमीनी स्तर की राजनीति से जुड़ी रही हैं। सतीशन की शैक्षणिक पृष्ठभूमि अत्यंत मजबूत रही है, क्योंकि उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पनांगड हाईस्कूल से प्राप्त की थी, जो उस क्षेत्र का एक लोकप्रिय विद्यालय है। इसके उपरांत, उन्होंने सैक्रेड हार्ट कॉलेज, थेवारा से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और राजगिरी कॉलेज ऑफ सोशल साइंसेज, कोच्चि से मास्टर ऑफ सोशल वर्क की डिग्री भी हासिल की। राजनीति में प्रवेश करने से पूर्व उन्होंने कानून का गहन अध्ययन किया था, जिसके तहत उन्होंने केरलम लॉ एकेडमी लॉ कॉलेज से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की और गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, तिरुवनंतपुरम से मास्टर ऑफ लॉ (एलएलएम) की उपाधि भी हासिल की, यही कारण है कि वीडी सतीशन को जानने वाले उन्हें एक किताबी कीड़ा अर्थात अध्ययन में गहरी रुचि रखने वाला नेता मानते हैं।
वीडी सतीशन का राजनीतिक सफर
सतीशन का राजनीतिक सफर उनके छात्र जीवन के दौरान ही प्रारंभ हो गया था, दरअसल उन्होंने जमीनी स्तर की राजनीति में केरलम स्टूडेंट्स यूनियन (केएसयू) के माध्यम से कदम रखा था। अपने छात्र जीवन में ही वे एक मुखर नेता के रूप में उभरे और वर्ष 1986-1987 के दौरान महात्मा गांधी विश्वविद्यालय संघ के अध्यक्ष चुने गए, इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस की छात्र शाखा नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) के राष्ट्रीय सचिव का दायित्व भी सफलतापूर्वक निभाया। हालांकि, राजनीति में शुरुआती सक्रियता के बावजूद उन्होंने लंबे समय तक वकालत को अपना मुख्य पेशा बनाए रखा, जिसके तहत वे एक प्रशिक्षित वकील और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे। उन्होंने लगभग दस वर्षों तक केरलम उच्च न्यायालय में वकालत की, और इसी अवधि में वे यूथ कांग्रेस में भी सक्रिय रूप से कार्य करते रहे, धीरे-धीरे उन्होंने एक तेजतर्रार वक्ता तथा आक्रामक राजनीतिक आयोजक के रूप में अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर ली। उनकी चुनावी राजनीति में पहली प्रविष्टि वर्ष 1996 में हुई थी, जब उन्होंने परावूर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन यह क्षेत्र तब कम्युनिस्ट पार्टी का गढ़ माना जाता था और उन्हें भाकपा के उम्मीदवार पी. राजू से हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बावजूद सतीशन ने हार नहीं मानी और क्षेत्र में अपनी सक्रियता बनाए रखी, जिसका परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2001 में उन्हें अपनी पहली बड़ी राजनीतिक सफलता मिली, जब वे परवूर निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार केरलम विधानसभा के लिए विधायक चुने गए। यह उल्लेखनीय है कि जिस समय वे 2001 में पहली बार विधायक बने थे, उस समय भी वे केरलम उच्च न्यायालय में वकालत का कार्य कर रहे थे।
पहली जीत के बाद लगातार मजबूत होती गई राजनीतिक पकड़
पहली बार विधायक चुने जाने के पश्चात वीडी सतीशन ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी बेदाग जमीनी पकड़ तथा आक्रामक राजनीति के बल पर स्वयं को केरलम के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाया। उन्होंने परवूर को कांग्रेस का एक अजेय किला बनाया, क्योंकि 2001 में पहली बार इस निर्वाचन क्षेत्र से जीतने के बाद यह क्षेत्र उनकी राजनीति की प्रयोगशाला और लॉन्चपैड बन गया था। उन्होंने 2001 के बाद से यहां कोई भी चुनाव नहीं हारा और लगातार छह बार (2001, 2006, 2011, 2016, 2021 और 2026) विधायक चुने गए, जिसके तहत उन्होंने 2006 में केएम दिनाकरन, 2011 में भाकपा के पन्नियन रवींद्रन और 2016 में शारदा मोहन जैसे कद्दावर वामपंथी नेताओं को बड़े अंतर से पराजित किया। अपने क्षेत्र में उन्होंने लाखों निवासियों के लिए बड़े पैमाने पर पेयजल परियोजना जैसी जमीनी पहल कीं, जिन्होंने राजनीति से परे उनकी विश्वसनीयता को और अधिक सुदृढ़ किया। वर्ष 2011 से 2016 के बीच जब राज्य में यूडीएफ की सरकार थी, तब सतीशन पार्टी के भीतर ही एक बागी आवाज के रूप में जाने जाते थे, क्योंकि उन्होंने हरित राजनीति का समर्थन किया और अपनी ही पार्टी के नेताओं के प्रभावशाली सामुदायिक नेताओं के आगे झुकने का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने हमेशा चुनाव में टिकट बंटवारे के लिए योग्यता को ही पैमाना बनाने की वकालत की, इसके अतिरिक्त 12वीं विधानसभा के दौरान उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुख्य सचेतक (मुख्य व्हिप) के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई थी।
एक विधायक के तौर पर सतीशन ने सदन में अनगिनत बहसों का नेतृत्व किया और पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के शासनकाल के दौरान विकास के दावों पर कड़े सवाल उठाकर वामपंथी सरकार के खिलाफ स्वयं को विपक्ष की मुख्य और सबसे मुखर आवाज के रूप में स्थापित किया। उनकी इस आक्रामकता की वजह से उन्हें अक्सर सोशल मीडिया पर वामपंथी समर्थकों के तीखे हमलों का भी सामना करना पड़ा था। उनके राजनीतिक करियर में सबसे बड़ा उछाल वर्ष 2021 में आया, क्योंकि केरल की राजनीति में हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन एक चलन की तरह रहा है, हालांकि 2021 के चुनाव में वामपंथी मोर्चे ने लगातार दूसरी बार यूडीएफ को चुनाव में पराजित कर दिया था। इस हार के बाद कांग्रेस आलाकमान ने वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला के स्थान पर सतीशन को 15वीं विधानसभा में विपक्ष का नेता नियुक्त किया, चूंकि उनके पास किसी भी मंत्री पद का कोई पूर्व अनुभव नहीं था, इसलिए कई लोगों ने इस फैसले को जोखिम भरा माना था, लेकिन उन्होंने अगले पांच वर्षों में स्वयं को विजयन सरकार के प्रमुख विकल्प और सबसे तेजतर्रार आलोचक के रूप में सफलतापूर्वक बदल दिया।
राजनीति से संन्यास का किया था ऐलान
वर्ष 2026 के विधानसभा चुनावों में सतीशन ने पूरे अभियान की कमान संभाली और सार्वजनिक रूप से यह कसम खाई कि यदि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन को 140 में से 100 सीटें नहीं मिलतीं, तो वे राजनीति छोड़कर संन्यास ले लेंगे। उनका यह जुआ सफल रहा और यूडीएफ ने 102 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जबकि सतीशन ने स्वयं परवूर से 20,600 वोटों के भारी अंतर से अपनी छठी जीत हासिल की। एक समय पार्टी के दूसरे दर्जे के नेता माने जाने वाले सतीशन, आज यूडीएफ की सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) और कार्यकर्ताओं के भारी समर्थन के साथ केरलम के मुख्यमंत्री नामित हुए हैं।
केरलम विधानसभा चुनाव में भारी जीत दर्ज करने के बावजूद कांग्रेस को वीडी सतीशन के नाम का आधिकारिक एलान करने में दस दिन का समय लगा, जिसके पीछे मुख्य रूप से पार्टी की आंतरिक खींचतान और कई रणनीतिक कारण निहित थे। मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस के भीतर तीन कद्दावर नेताओं, वीडी सतीशन, केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला के बीच सीधा और कड़ा मुकाबला था, जिसमें चेन्निथला अपनी वरिष्ठता के आधार पर शीर्ष पद की मांग कर रहे थे, जबकि सतीशन के समर्थकों का तर्क था कि उन्होंने पिछले पांच वर्षों तक विपक्ष के नेता के रूप में संघर्ष किया और गठबंधन को जीत दिलाई। राजनीतिक जानकारों और रिपोर्ट्स के अनुसार, कांग्रेस आलाकमान एक बड़ी दुविधा में फंसा हुआ था, एक तरफ वीडी सतीशन थे जिन्होंने चुनाव अभियान का नेतृत्व किया था, तो दूसरी तरफ केसी वेणुगोपाल थे जिन्हें राहुल गांधी के सबसे करीबी राजनीतिक सहयोगियों में से एक माना जाता है। बताया गया कि नवनिर्वाचित विधायकों के एक बड़े वर्ग का समर्थन वेणुगोपाल को मिला था, जिसके कारण दिल्ली (केंद्रीय नेतृत्व) और राज्य के नेता (सतीशन) के बीच चयन करना कठिन हो गया था।
सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने में एक और बाधा उनके अनुभव की कमी थी, क्योंकि पार्टी के भीतर आलोचकों ने यह तर्क दिया कि सतीशन एक बहुत आक्रामक विपक्षी नेता और प्रचारक तो अवश्य हैं, लेकिन उन्होंने अतीत में कभी कोई मंत्री पद नहीं संभाला है, इसलिए जटिल नौकरशाही और गठबंधन की राजनीति को संभालने के लिए उनके प्रशासनिक अनुभव पर प्रश्न उठाए गए थे। सीएम के चुनाव में इस देरी का बचाव करते हुए चांडी ओमन और तारिक अनवर जैसे नेताओं ने यह कहा कि कांग्रेस कोई निरंकुश पार्टी नहीं है, बल्कि किसी भी नेता या गुट को नाराज किए बिना एक आम सहमति बनाने के लिए विधायकों, पूर्व प्रदेश अध्यक्षों और सहयोगी दलों से विचार-विमर्श करने में यह समय लगा। पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि मध्य प्रदेश या राजस्थान की तरह केरलम में जीत के बाद कोई बगावत न हो, जिसके लिए सभी पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श आवश्यक था।






