जल संसाधन दिवस: दुनियाभर में गहराता जल संकट, सीएम मोहन यादव ने किया जल संरक्षण का आह्वान

अगर पूरी धरती के पानी को उदाहरण के लिए 100 लीटर मान लें तो हमारे सीधे इस्तेमाल लायक आधा चम्मच पानी भी नहीं निकलेगा। बाकी सब या तो खारा समुद्री पानी है या ग्लेशियरों बर्फ के रूप में है। दुनिया के 92 फीसदी पानी का इस्तेमाल खाने की चीजों के उत्पादन में जाता है। आपको ये बात हैरान कर सकती है कि आपकी एक कप कॉफी पीने के पीछे लगभग 130 लीटर पानी लगता है जो कि बीन्स उगाने, प्रोसेसिंग और ट्रांसपोर्ट में खर्च होता है। ये आंकड़े बताते हैं कि पानी सिर्फ पीने के लिए ही नहीं बल्कि हर वस्तु और सेवा के पीछे छिपा हुआ एक महत्वपूर्ण संसाधन है। इसलिए पानी का महत्व समझते हुए इसका संरक्षण करना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है।
Water Pani

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जल जीवन का आधार है। मानव शरीर से लेकर कृषि, उद्योग और पर्यावरण तक हर क्षेत्र पानी पर निर्भर है। इसके बिना जीवन की कल्पना संभव ही नहीं। लेकिन विडंबना यह है कि आज यही अमूल्य संसाधन गंभीर संकट का सामना कर रहा है। जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि और जल स्रोतों के अत्यधिक दोहन ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। दस अप्रैल को मनाया जाने वाला “जल संसाधन दिवस”  इसी बढ़ते खतरे के प्रति दुनिया को सचेत करने का काम करता है।

आज के दिन मुख्यमंत्री मोहन यादव ने प्रदेशवासियों से जल संरक्षण का अह्वान किया है। उन्होंने कहा कि “जल सिर्फ जीवन का आधार ही नहीं, बल्कि सृष्टि का सार भी है। हर बूंद में भविष्य की सुरक्षा और समृद्धि का संदेश निहित है। आइए, जल संसाधन दिवस के अवसर पर हम संकल्प लें कि जल के संरक्षण, संवर्धन और संतुलित उपयोग के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य सुरक्षित करेंगे।”

जल नहीं तो कल नहीं

पानी के बिना कुछ भी संभव नहीं है। न हम जी सकते हैं, न अन्य जीव और वनस्पति का अस्तित्व बचेगा। खेती-बाड़ी, फैक्टरियों,  घरेलू काम और हमारा रोजमर्रा का जीवन पानी की नींव पर टिका है। इसीलिए हमारे यहां सनातन काल से ही जल को देवता माना गया है। वेदों में लिखा है “आपो हिष्ठा मयोभुवः” यानी पानी ही सुख और समृद्धि का मूल है। सिंधु घाटी की सभ्यता हो या गंगा किनारे बसी बस्तियां..सब पानी के आसपास फली-फूलीं। लेकिन समय के साथ स्थितियां बदलती गईं। पानी के अपव्यय के कारण आज हालात बदल गए हैं।

जल संरक्षण है बेहद जरूरी 

बढ़ती आबादी, फैक्टरियों का कचरा, भूजल का बेरोकटोक दोहन और मौसम की अनियमितता ने पानी के स्रोतों को सुखा दिया है। ऐसे में पानी बचाना सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि भविष्य की सलामती का सवाल बन गया है। संयुक्त राष्ट्र  के अनुसार, दुनिया की बड़ी आबादी आज भी स्वच्छ पेयजल से वंचित है। पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का सिर्फ 2.5 प्रतिशत ही मीठा पानी है और उसमें से भी सीमित मात्रा ही उपयोग के योग्य है। अगर हमें मानव सभ्यता, प्रकृति और अपनी धरती को बचाना है तो पानी बचाना बेहद आवश्यक है। इसी सोच के साथ हर साल 10 अप्रैल को जल संसाधन दिवस मनाया जाता है।

भारत में पानी की गंभीर स्थिति 

पानी को लेकर भारत की स्थिति भी चिंताजनक है। देश में विश्व की लगभग 18 प्रतिशत आबादी रहती है लेकिन जल संसाधन लगभग 4 प्रतिशत ही हैं। लगातार गिरता भूजल स्तर, नदियों का प्रदूषण और अनियंत्रित जल उपयोग इस संकट को और बढ़ा रहे हैं। मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में गर्मियों के दौरान पानी की किल्लत आम हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग पीने के पानी के लिए लंबी दूरी तय करने को मजबूर हैं, जबकि शहरों में जल आपूर्ति पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि जल संरक्षण और प्रबंधन के प्रभावी उपाय नहीं अपनाए गए तो आने वाले समय में स्थिति और भयावह हो सकती है।

इस तरह बचा सकते हैं पानी

जल संकट को देखते हुए पानी का सही प्रबंधन और संरक्षण बेहद आवश्यक हो गया है। इसके लिए वर्षा जल संचयन एक प्रभावी उपाय है जिसमें बारिश के पानी को छतों या खुले स्थानों से एकत्र कर टैंकों में संग्रहित किया जाता है या जमीन में उतारकर भूजल स्तर बढ़ाया जाता है। इसी तरह ग्राउंड वॉटर रिचार्ज से कुएं और सोख्ता गड्ढों के माध्यम से पानी को वापस जमीन में पहुंचाया जाता है, जिससे सूखते जल स्रोतों को फिर से जीवित किया जा सकता है।

कृषि क्षेत्र में ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों के उपयोग से पानी की काफी बचत होती है और फसल उत्पादन भी बेहतर होता है। रोजमर्रा के जीवन में जल संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है जिसमें नल को खुला न छोड़ना, रिसाव को तुरंत ठीक करना और जरूरत के अनुसार ही पानी का उपयोग करना शामिल है। इसके अलावा नदियों, तालाबों और झीलों जैसे जल स्रोतों का संरक्षण जरूरी है, ताकि प्रदूषण को रोका जा सके और जल की गुणवत्ता बनी रहे। गांवों में छोटे बांध और चेक डैम बनाकर बारिश के पानी को रोका जा सकता है, जिससे भूजल स्तर में सुधार होता है। वृक्षारोपण भी जल संरक्षण में अहम भूमिका निभाता है क्योंकि पेड़ वर्षा जल को जमीन में समाहित करने में मदद करते हैं।

औद्योगिक स्तर पर पानी की रीसाइक्लिंग और ट्रीटमेंट को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि जल प्रदूषण कम हो और पानी का दोबारा उपयोग हो सके। घरेलू स्तर पर भी पानी का दुबारा उपयोग किया जा सकता है, जैसे कपड़े धोने या आरओ का बचा पानी पौधों में इस्तेमाल करना। पानी बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है और हम अपने अपने स्तर पर इसके लिए प्रयास करें तो इस संकट को हल किया जा सकता है। कहते हैं बूंद बूंद से घड़ा भरता है..उसी तरह हम सबकी छोटी छोटी कोशिश भी इस दिशा में अहम साबित हो सकती है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
Shruty Kushwaha

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J.), 2001. 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल और लाइव इंडिया मुंबई में कार्य.

2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha →
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