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विश्व नेत्रदान दिवस: एक संकल्प जो किसी की दुनिया रोशन कर सकता है, जानिए इस दिन का इतिहास और महत्व

Written by:Shruty Kushwaha
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नेत्रदान करने वाला व्यक्ति मृत्यु के बाद भी "जीवित" रह सकता है क्योंकि उनका कॉर्निया किसी और के जीवन मे प्रकाश फैलाता है। कॉर्नियल प्रत्यारोपण दुनिया में सबसे सफल प्रत्यारोपण में से एक है, जिसकी सफलता दर 90% से अधिक है। भारत में कई मशहूर हस्तियों जैसे अभिनेता आमिर खान और ऐश्वर्या राय ने नेत्रदान का संकल्प लिया है और इसके लिए कई जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं।
विश्व नेत्रदान दिवस: एक संकल्प जो किसी की दुनिया रोशन कर सकता है, जानिए इस दिन का इतिहास और महत्व

आज विश्व नेत्रदान दिवस है। हर साल ये दिन पूरी दुनिया में नेत्रदान के प्रति जागरूकता फैलाने और इसके महत्व को रेखांकित करने के उद्देश्य से मनाया जाता है। यह दिन लोगों को प्रेरित करता है कि हम अपनी मृत्यु के बाद अपनी आँखें दान कर किसी के जीवन में रोशनी ला सकते हैं।

आज भी हमारे यहां अंधविश्वास, जानकारी की कमी और सामाजिक हिचकिचाहट के कारण लाखों नेत्र प्रत्यारोपण की संभावनाएं अधूरी रह जाती हैं। जबकि नेत्रदान एक वैज्ञानिक और मानवीय कार्य है जिससे किसी के जीवन में रोशनी लौट सकती है।

विश्व नेत्रदान दिवस का इतिहास

विश्व नेत्रदान दिवस की शुरुआत 1986 में भारत में हुई। इसकी पहल मुख्य रूप से भारतीय नेत्र रोग विशेषज्ञों, नेत्र बैंकों, और सामाजिक संगठनों जैसे रोटरी क्लब और लायंस क्लब द्वारा की गई थी। इसका प्राथमिक लक्ष्य कॉर्नियल अंधापन, जो भारत और विश्व में दृष्टिहीनता का एक प्रमुख कारण था, से निपटने के लिए जागरूकता बढ़ाना था। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, उस समय विश्व में लगभग 1.5 करोड़ लोग कॉर्नियल अंधापन से पीड़ित थे जिनमें से अधिकांश विकासशील देशों में थे और नेत्रदान इस समस्या का एक प्रभावी समाधान हो सकता है।

नेत्रदान का महत्व

नेत्रदान एक ऐसा परोपकारी कार्य है जिसके माध्यम से एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी कॉर्निया दान की जा सकती है, जो किसी दृष्टिहीन व्यक्ति को दृष्टि प्रदान कर सकती है। एक नेत्रदाता की आँखें दो लोगों के जीवन में रोशनी ला सकती हैं। कोई भी नेत्रदाता न सिर्फ दृष्टिहीनता को कम करने में मदद करता है, बल्कि मृत्यु के बाद भी किसी और के जीवन में रोशनी बनकर जगमगा सकती है।

क्यों है नेत्रदान की ज़रूरत

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 12 लाख लोग कॉर्नियल अंधेपन से पीड़ित हैं और हर साल 20 से 30 हज़ार नए मामले सामने आते हैं। इसके बावजूद, भारत में नेत्रदान की दर बहुत कम है। एक अनुमान के मुताबिक, देश में हर साल सिर्फ 50,000 कॉर्निया दान में प्राप्त होती हैं, जबकि आवश्यकता 2 लाख से अधिक की है। इस कमी का मुख्य कारण जागरूकता की कमी, मिथक और सामाजिक भ्रांतियां हैं जैसे कि नेत्रदान से चेहरा विकृत हो जाता है या यह धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है।

वास्तव में नेत्रदान एक पूरी तरह सुरक्षित और वैज्ञानिक प्रक्रिया है। किसी का भी कॉर्निया सिर्फ मृत्यु के बाद लिया जाता है और यह प्रक्रिया चेहरे के आकार को प्रभावित नहीं करती है। नेत्र बैंकों और अस्पतालों द्वारा इस प्रक्रिया को अत्यंत पारदर्शिता और नैतिकता के साथ किया जाता है। आज के दिन हम भी नेत्रदान का संकल्प ले सकते हैं और अपने बाद किसी और के जीवन में उजियारा फैला सकते हैं।

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