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विश्व डाक दिवस: डाकिए की दस्तक से डिजिटल सेवाओं तक देश को जोड़ने का सफर

एक ज़माना था... डाकिए का आना जैसे रोज़ की बात हो। डाकिया जैसे कोई दोस्त या परिचित हो। कभी उसकी साइकिल की घंटी सुनकर बच्चे दरवाजे की ओर दौड़ पड़ते, तो कभी घर के बड़े किसी चिट्ठी के इंतजार में राह तकते रहते। उसके थैले में न जाने कितने घरों की खुशियां, अपनों की यादें और दूर बैठे किसी अपने का हाल छिपा होता था। बदलते समय के साथ इसने पार्सल, बैंकिंग और कई जरूरी सेवाओं के जरिए लोगों की जिंदगी में अपनी जगह बनाए रखी है।
World Post Day

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घर के दरवाजे पर डाकिए की दस्तक और हाथ में अपनों की चिट्ठी… एक दौर था जब यह छोटी-सी बात पूरे घर में खुशी भर देती थी। कोई दूर शहर में पढ़ रहे बेटे की चिट्ठी का इंतजार करता था तो किसी मां को अपनी बेटी की कुशलक्षेम जानने की आस रहती थी। समय बदलने के साथ उन चिट्ठियों की जगह मोबाइल संदेशों ने ले ली, लेकिन लोगों को जोड़ने वाली डाक सेवा का महत्व आज भी कायम है।

आज विश्व डाक दिवस है। यह दिन दुनिया भर में डाक सेवाओं के योगदान, उनके इतिहास और बदलते दौर में उनकी प्रासंगिकता को याद करने का अवसर है। इसका उद्देश्य लोगों को डाक सेवाओं के महत्व के प्रति जागरूक करना और सामाजिक आर्थिक विकास में उनकी भूमिका को रेखांकित करना है। इस दिन उन डाक कर्मचारियों के समर्पण को भी सम्मान दिया जाता है, जो वर्षों से देश के कोने-कोने तक संदेश और जरूरी सेवाएं पहुंचा रहे हैं।

1874 में हुई विश्व डाक दिवस की शुरुआत

विश्व डाक दिवस मनाने की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय डाक व्यवस्था के इतिहास से जुड़ी है। 9 अक्टूबर 1874 को स्विट्जरलैंड के बर्न शहर में 22 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद जनरल पोस्टल यूनियन की स्थापना हुई। वर्ष 1878 में इसका नाम यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन कर दिया गया। बाद में 1969 में जापान के टोक्यो में आयोजित यूपीयू कांग्रेस में 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। इसका उद्देश्य डाक सेवाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना और सामाजिक-आर्थिक विकास में उनकी भूमिका को रेखांकित करना है।

भारत में सदियों पुरानी है डाक व्यवस्था की परंपरा

भारत में संदेश पहुंचाने की व्यवस्था का इतिहास सदियों पुराना है। प्राचीन काल में राजा-महाराजा संदेश भेजने के लिए दूतों का सहारा लेते थे। बाद में पैदल संदेशवाहकों और घुड़सवारों के जरिए सूचनाएं एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाई जाने लगीं। वर्ष 1541 में शेरशाह सूरी ने बंगाल से सिंध तक घुड़सवार डाक व्यवस्था को व्यवस्थित किया। ब्रिटिश शासन के दौरान डाक व्यवस्था का विस्तार हुआ और 31 मार्च 1774 को कोलकाता का जनरल पोस्ट ऑफिस शुरू किया गया। वर्ष 1854 में डाक व्यवस्था को संगठित और आधुनिक स्वरूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। इसके बाद पोस्टकार्ड, मनीऑर्डर, डाक बचत बैंक और स्पीड पोस्ट जैसी सुविधाएं शुरू हुईं और डाक सेवा आम लोगों के जीवन से जुड़ती चली गई।

चिट्ठियों से आगे बढ़कर बदलती जरूरतों का साथी बना डाकघर

डाक सेवा की पहचान भले ही चिट्ठियों से रही हो, लेकिन आज इसकी भूमिका कहीं अधिक व्यापक हो चुकी है। भारतीय डाक विभाग बचत योजनाओं, डाक जीवन बीमा, पार्सल और कई सरकारी सेवाओं के जरिए लोगों तक पहुंच रहा है। देश के दूरदराज के गांवों में डाकघर आज भी जरूरी सेवाओं का माध्यम हैं। ऐसे इलाकों में जहां हर सुविधा आसानी से उपलब्ध नहीं होती, वहां डाक व्यवस्था लोगों को वित्तीय सेवाओं और सरकारी योजनाओं से जोड़ने में मदद करती है।

डिजिटल दौर में डाक विभाग भी तकनीक के साथ आगे बढ़ रहा है। पार्सल की ट्रैकिंग से लेकर ऑनलाइन भुगतान और आधुनिक डाक सेवाओं तक, इसकी कार्यप्रणाली में लगातार बदलाव हो रहे हैं। हालांकि, इस बदलाव के बीच डाक सेवा की सबसे बड़ी ताकत उसकी व्यापक पहुंच और लोगों का भरोसा है।

डाकिए की मेहनत को सलाम करने का दिन

विश्व डाक दिवस उन कर्मचारियों के योगदान को याद करने का भी अवसर है, जो चिट्ठियां, जरूरी दस्तावेज और पार्सल लोगों तक पहुंचाने के लिए लगातार काम करते हैं। बारिश हो या तेज धूप, पहाड़ी रास्ते हों या दूरदराज के गांव, डाक कर्मचारियों की जिम्मेदारी लोगों तक संदेश और सेवाएं पहुंचाना है। उनके लिए एक लिफाफा किसी की खुशी की खबर हो सकता है, तो कोई दस्तावेज किसी के जरूरी काम से जुड़ा हो सकता है।

विश्व डाक दिवस का उद्देश्य सिर्फ पुरानी डाक व्यवस्था की यादों को ताजा करना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि समाज को जोड़ने में इस सेवा की भूमिका आज भी कितनी महत्वपूर्ण है। संचार के साधन बदलने के बावजूद डाक व्यवस्था जरूरतमंद लोगों तक पहुंचने, व्यापार को सहारा देने और दूरियों को कम करने का काम कर रही है।

मुख्यमंत्री ने दी शुभकामनाएं

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विश्व डाक दिवस पर डाक सेवा के इसी योगदान को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा कि वर्षों से देश के कोने-कोने को जोड़ते हुए डाक सेवा ने संदेश, सेवाएं और आवश्यक सुविधाएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बदलते समय के साथ आधुनिक और सुदृढ़ हो रही डाक व्यवस्था आज भी सभी के जीवन का आवश्यक हिस्सा है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha →
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