Hindi News

लाखों का फंड कागजों में, मजबूर महिलाओं ने अपने हाथों से साफ की गंदी नालियां, जिम्मेदार गहरी नींद में

Reported by:Kamlesh Sarda|Edited by:Atul Saxena
Published:
थडोद की यह तस्वीर एक चुभता हुआ सवाल छोड़ जाती है कि आखिर सफाई का वह लाखों रुपये का फंड जा कहां रहा है? क्या विकास सिर्फ फाइलों में हो रहा है?
लाखों का फंड कागजों में, मजबूर महिलाओं ने अपने हाथों से साफ की गंदी नालियां, जिम्मेदार गहरी नींद में

A woman cleans dirty drain wit hands Thadod village Singoli Neemuch

विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच नीमच जिले के सिंगोली तहसील के थडोद गांव से एक ऐसी मार्मिक तस्वीर सामने आई है, जो सिस्टम की संवेदनहीनता पर गहरी चोट करती है। जिस गांव की सफाई के लिए हर साल लाखों रुपये का सरकारी फंड आता है, वहां आज गंदगी का ऐसा साम्राज्य है कि लोगों का सांस लेना भी मुहाल हो गया है।

सबसे ज्यादा पीड़ा देने वाला दृश्य वह है, जब पंचायत के नुमाइंदों ने ग्रामीणों की फरियाद पर आंखें मूंद लीं और बदबू व बीमारियों से घुटते अपने परिवारों को बचाने के लिए थडोद गांव की महिलाओं को खुद आगे आना पड़ा। जिन हाथों में सम्मान होना चाहिए था, आज उन हाथों में फावड़ा और तसला है। सिस्टम की बेरुखी से हारकर ये महिलाएं खुद गंदी और बजबजाती नालियों में उतरकर, अपने हाथों से कचरा साफ करने को विवश हैं।

जिम्मेदार गहरी नींद में, महिलाएं अपने हाथ से साफ कर रहीं गांव की गंदगी 

सरपंच और सचिव से बार-बार मिन्नतें करने के बाद भी जब किसी का दिल नहीं पसीजा, तो इन महिलाओं ने अपने गांव का स्वास्थ्य बचाने का जिम्मा खुद उठा लिया। रुके हुए गंदे पानी से गांव में डेंगू और मलेरिया जैसी जानलेवा बीमारियों की दहशत फैली हुई है, लेकिन जिम्मेदार गहरी नींद में सो रहे हैं।

बड़ा सवाल गांव के लिए सफाई के नाम पर आ रहा लाखों का फंड कहाँ जा रहा?

थडोद की यह तस्वीर एक चुभता हुआ सवाल छोड़ जाती है कि आखिर सफाई का वह लाखों रुपये का फंड जा कहां रहा है? क्या विकास सिर्फ फाइलों में हो रहा है? बेबसी और गुस्से से भरे ग्रामीण अब इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की गुहार लगा रहे हैं। यदि अब भी सुनवाई नहीं हुई, तो यह दर्द एक बड़े जनआंदोलन में बदल जाएगा।

Atul Saxena
लेखक के बारे में
पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena
Follow Us :GoogleNews