राजस्थान में 75 वर्ष की उम्र में राजनीतिक संन्यास का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सार्वजनिक रूप से सलाह दी है कि उन्हें अब राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए। राठौड़ के इस बयान के बाद तुरंत सियासी हलचल शुरू हो गई है, क्योंकि विपक्ष ने इसे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़कर बीजेपी पर हमला बोला है।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ था जब बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ मीडिया से बात कर रहे थे। दरअसल वे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा राज्य सरकार पर लगातार लगाए जा रहे आरोपों का जवाब दे रहे थे। इसी दौरान राठौड़ ने गहलोत की उम्र का जिक्र करते हुए कहा था, “गहलोत साहब को अब धैर्य रखना चाहिए। 75 वर्ष के बाद तो संन्यास आश्रम होता है, इसलिए उन्हें संन्यास आश्रम चले जाना चाहिए।” इस टिप्पणी को गहलोत पर सीधा तंज माना गया था, जो राजस्थान की राजनीति का एक अनुभवी चेहरा रहे हैं।
दरअसल राठौड़ के इस बयान पर कांग्रेस ने तुरंत जवाब दिया है। राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने मोर्चा संभाला है और बीजेपी अध्यक्ष को घेरा है। जूली ने राठौड़ की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा है, “मदन राठौड़ असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुर्सी से हटाना चाहते हैं।” उन्होंने तंज कसते हुए कहा है कि राठौड़ का बयान सिर्फ गहलोत पर निशाना नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक अलग राजनीतिक सोच भी हो सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करता एक गुट : टीकाराम जूली
वहीं जूली ने अपने आरोप को और मजबूत करते हुए कहा है कि बीजेपी के अंदर एक ऐसा गुट भी मौजूद है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करता है। उन्होंने सीधे तौर पर इशारा किया है कि शायद मदन राठौड़ उसी गुट का हिस्सा हैं। जूली ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उम्र भी 75 वर्ष हो चुकी है और ’75 वर्ष के बाद राजनीतिक संन्यास’ की बात कहकर राठौड़ अप्रत्यक्ष रूप से मोदी को उनके पद से हटाने की बात कर रहे हैं। यह आरोप बीजेपी के अंदर की राजनीति और गुटबाजी पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
पुराना ’75 वर्ष नियम’ भी याद दिलाया
दरअसल नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने बीजेपी को उसका पुराना ’75 वर्ष नियम’ भी याद दिलाया है। उन्होंने साफ कहा है कि बीजेपी ने पहले भी इसी नियम का हवाला देकर अपने कई वरिष्ठ और बड़े नेताओं को सक्रिय राजनीति से अलग कर दिया था। जूली ने लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे बीजेपी के संस्थापक नेताओं का उदाहरण दिया है, जिन्हें 2014 के बाद सक्रिय राजनीति से दूर कर दिया गया था। इस संदर्भ ने राठौड़ के बयान को और भी संवेदनशील बना दिया है।
बता दें कि भारतीय राजनीति में 75 वर्ष की उम्र के बाद सक्रिय राजनीति से संन्यास का मुद्दा नया नहीं रहा है। वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तब भी यह बहस तेज हुई थी कि 75 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ नेताओं को सरकार और संगठन में बड़े पदों से दूर रखा जाना चाहिए। उस समय इस नीति को ‘मार्गदर्शक मंडल’ बनाने के फैसले से जोड़कर देखा गया था, जिसमें आडवाणी और जोशी जैसे नेताओं को शामिल किया गया था, लेकिन उन्हें कोई कार्यकारी जिम्मेदारी नहीं दी गई थी।
दरअसल मदन राठौड़ के ताजा बयान ने इस पहले से शांत पड़ी बहस को एक बार फिर हवा दे दी है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि इस बयान के दूर तक असर हो सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विपक्ष द्वारा इस बयान को सीधे प्रधानमंत्री मोदी से जोड़ने के बाद मदन राठौड़ के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को इस मुद्दे पर सफाई देनी पड़ सकती है, ताकि यह संदेश न जाए कि पार्टी के भीतर प्रधानमंत्री की उम्र को लेकर कोई असंतोष है। इस पूरे मामले ने राजस्थान ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी नई बहस शुरू कर दी है।






