दीपावली की रात किन-किन स्थानों पर दीपक जलाना माना जाता है शुभ? जानें हर स्थान का धार्मिक महत्व

दीपावली पर मुख्य द्वार, तुलसी, पूजा स्थल, आंगन और रसोईघर सहित कई स्थानों पर दीपक जलाने की परंपरा, जानें इसके पीछे की धार्मिक मान्यताएं
Diwali 2026

Diwali 2026: दीपावली पर घरों को दीपकों से सजाने की परंपरा सदियों पुरानी है। कार्तिक अमावस्या की रात जब घरों में लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है, तो मुख्य द्वार से लेकर आंगन और तुलसी के चौरे तक दीपक जलाए जाते हैं। हिंदू धर्म में दीपक को प्रकाश, शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली पर अलग-अलग स्थानों पर दीपक जलाने का अपना विशेष महत्व है। कहीं इसे माता लक्ष्मी के स्वागत से जोड़ा जाता है, तो कहीं परिवार की सुख-समृद्धि, पितरों के स्मरण और भगवान की आराधना से।

घर के मुख्य द्वार पर दीपक

दीपावली पर घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर दीपक जलाने की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन माता लक्ष्मी घरों में आती हैं और मुख्य द्वार पर जलने वाले दीपक उनके स्वागत का प्रतीक होते हैं। कई परिवारों में मुख्य दरवाजे पर रंगोली बनाकर उसके आसपास दीपक सजाए जाते हैं। इसे घर में सुख-समृद्धि और शुभता के स्वागत से जोड़कर देखा जाता है।

पूजा स्थल पर दीपक

दीपावली की शाम लक्ष्मी-गणेश पूजन के दौरान पूजा स्थल पर घी या तेल का दीपक जलाया जाता है। हिंदू पूजा परंपरा में दीपक का विशेष स्थान है। इसे ज्ञान, आस्था और अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने का प्रतीक माना गया है। कई परिवारों में पूजा के समय जलाया गया दीपक देर रात तक जलाए रखने की परंपरा भी है।

तुलसी के पौधे के पास दीपक

हिंदू धर्म में तुलसी को पवित्र माना गया है और भगवान विष्णु की आराधना से इसका विशेष संबंध है। दीपावली की शाम तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाने की परंपरा कई घरों में निभाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, तुलसी के पास दीपक जलाना भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का एक तरीका है। कार्तिक महीने में तुलसी के समीप दीपदान का विशेष महत्व भी बताया जाता है।

घर के आंगन में दीपक

दीपावली पर आंगन में दीपक जलाने की परंपरा घर को प्रकाश से भरने के साथ परिवार की खुशहाली की कामना से जुड़ी है। पुराने समय में घर का आंगन पारिवारिक और धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख स्थान हुआ करता था। इसी कारण दीपावली पर आंगन में दीपक सजाने और रंगोली बनाने की परंपरा आज भी कई परिवारों में प्रचलित है।

रसोईघर में दीपक

कुछ क्षेत्रों में दीपावली की रात रसोईघर में भी दीपक जलाया जाता है। भारतीय परंपरा में रसोई को अन्न और परिवार के पोषण से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान माना गया है। यहां दीपक जलाने की परंपरा को अन्नपूर्णा माता के प्रति श्रद्धा और घर में अन्न की कमी न होने की कामना से जोड़ा जाता है। हालांकि, यह सभी परिवारों में अनिवार्य रूप से निभाई जाने वाली परंपरा नहीं है।

घर के मंदिर में दीपक

जिन घरों में अलग से पूजा का स्थान या मंदिर होता है, वहां दीपावली पर विशेष दीपक जलाया जाता है। परिवार के सदस्य अपने आराध्य देवी-देवताओं का स्मरण कर सुख, शांति और मंगल की प्रार्थना करते हैं। कई परिवारों में कुलदेवी या कुलदेवता के नाम से भी दीपक जलाने की परंपरा है।

पीपल के वृक्ष के पास दीपक

हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पीपल के वृक्ष को पवित्र माना गया है। कुछ क्षेत्रों में दीपावली की रात पीपल के पास दीपक जलाने की परंपरा भी प्रचलित है। इसे भगवान विष्णु की आराधना और पितरों के स्मरण से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, पीपल के पास दीपक जलाने की परंपरा सभी क्षेत्रों में समान नहीं है और कई परिवार इसके लिए अलग दिन या विशेष अवसर निर्धारित करते हैं।

घर के बाहर और रास्ते में दीपक

दीपावली पर घर की चौखट, सीढ़ियों और बाहरी हिस्सों में दीपक सजाने की परंपरा भी है। कई स्थानों पर सार्वजनिक मंदिरों और धार्मिक स्थलों में दीपदान किया जाता है। इसे केवल घर की सजावट नहीं, बल्कि प्रकाश और खुशियां दूसरों के साथ बांटने की भावना से भी जोड़ा जाता है।

क्या दीपावली पर हर स्थान पर दीपक जलाना जरूरी है?

धार्मिक परंपराओं में दीपावली पर दीपदान को शुभ माना गया है, लेकिन सभी स्थानों पर दीपक जलाना अनिवार्य नहीं है। अलग-अलग राज्यों, समुदायों और परिवारों में दीपावली मनाने के अपने रीति-रिवाज हैं। कहीं मुख्य द्वार और पूजा स्थल पर दीपक जलाने को अधिक महत्व दिया जाता है, तो कहीं तुलसी, आंगन और अन्य स्थानों पर भी विशेष दीपदान किया जाता है।

दीपावली पर दीपक जलाने का मूल भाव अंधकार को दूर कर प्रकाश का स्वागत करना है। यही कारण है कि इस पर्व को केवल धन-समृद्धि की कामना से नहीं, बल्कि आस्था, शुभता और खुशियां बांटने की परंपरा से भी जोड़ा जाता है।

नोट: लेख में बताई गई परंपराएं प्रचलित धार्मिक और लोकमान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में दीपदान की विधि तथा महत्व अलग हो सकते हैं।

Bhawna Choubey
लेखक के बारे में
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