डोल पूर्णिमा 2026: 138 स्वर्ण आभूषणों से सजेगा जगन्नाथ दरबार, ग्रहण के बीच दिखेगा दिव्य सुना भेष

डोल पूर्णिमा पर पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ 138 प्रकार के स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित होंगे। चंद्र ग्रहण के कारण सुना भेष रात में होगा, जिसे देखने लाखों श्रद्धालु पहुंचेंगे।
डोल पूर्णिमा 2026

फाल्गुन मास की पूर्णिमा सिर्फ रंगों का पर्व नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम भी है। इसी दिन डोल पूर्णिमा मनाई जाती है, जिसे पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में बेहद भव्य रूप से मनाया जाता है। इस साल 3 मार्च 2026 को डोल पूर्णिमा का उत्सव खास रहेगा, क्योंकि चंद्र ग्रहण के बीच भगवान जगन्नाथ का दिव्य सुना भेष होगा।

डोल पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को 138 प्रकार के स्वर्ण आभूषणों से सजाया जाएगा। यह दृश्य इतना अलौकिक होता है कि लाखों श्रद्धालु सिर्फ इस एक झलक के लिए पुरी पहुंचते हैं। इस बार ग्रहण काल के कारण दर्शन का समय बदला गया है, जिससे उत्साह और भी बढ़ गया है।

डोल पूर्णिमा पर 138 स्वर्ण आभूषणों से होगा राजसी श्रृंगार

पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर डोल पूर्णिमा पर मानो स्वर्ण महल बन जाता है। भगवान जगन्नाथ का जो विशेष श्रृंगार होता है, उसे सुना भेष या राज राजेश्वर वेश कहा जाता है। डोल पूर्णिमा के इस पावन दिन भगवान को लगभग 138 प्रकार के स्वर्ण आभूषण पहनाए जाते हैं। इनमें सोने के हाथ (श्री भुज), सोने के पैर (श्री पयर), स्वर्ण मुकुट, कंठी माला, बाहुटी, राल कौरह और कई प्राचीन आभूषण शामिल होते हैं।

इन आभूषणों का कुल वजन 200 किलोग्राम से अधिक बताया जाता है। यह श्रृंगार सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि प्रभु की शाही सत्ता और दिव्यता का प्रतीक माना जाता है। डोल पूर्णिमा का यह भव्य दृश्य श्रद्धालुओं के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं होता।

चंद्र ग्रहण के कारण बदला सुना भेष का समय

इस साल 3 मार्च को सिंह राशि में चंद्र ग्रहण लग रहा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार ग्रहण दोपहर 2:20 बजे से शाम 6:47 बजे तक रहेगा। ग्रहण काल के दौरान मंदिर में कई धार्मिक नियम लागू होते हैं। इसी कारण भगवान जगन्नाथ का बहुप्रतीक्षित सुना भेष रात 8 बजे से 9 बजे के बीच आयोजित किया जाएगा।

डोल पूर्णिमा और चंद्र ग्रहण का यह दुर्लभ संयोग श्रद्धालुओं के लिए खास आध्यात्मिक महत्व रखता है। माना जाता है कि ग्रहण के बाद भगवान के दर्शन करना विशेष फलदायी होता है।

डोल यात्रा और डोल मंडप की अनोखी परंपरा

डोल पूर्णिमा का मुख्य आकर्षण डोल यात्रा है। इस दिन भगवान की उत्सव मूर्तियों को मंदिर के गर्भगृह से बाहर लाया जाता है। उन्हें भव्य पालकी में बैठाकर नगर भ्रमण कराया जाता है।

इसके बाद भगवान को डोल मंडप यानी दिव्य झूले पर विराजमान किया जाता है। भक्त अबीर और गुलाल के साथ प्रभु के चरणों में रंग अर्पित करते हैं। पुरी की यह परंपरा देश के अन्य हिस्सों से अलग है। जहां अधिकतर स्थानों पर राधा-कृष्ण की पूजा होती है, वहीं यहां डोल गोविंद, भूदेवी और श्रीदेवी की विशेष पूजा की जाती है। डोल पूर्णिमा का यह उत्सव महाप्रभु की 12 प्रमुख यात्राओं में से एक की शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है।

एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना

हर साल डोल पूर्णिमा पर पुरी में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। इस बार भी एक लाख से अधिक भक्तों के आने की संभावना जताई जा रही है। मंदिर प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्था के विशेष इंतजाम किए हैं। चंद्र ग्रहण के कारण समय में बदलाव के बावजूद भक्तों का उत्साह कम नहीं हुआ है। डोल पूर्णिमा 2026 में भगवान जगन्नाथ के 138 स्वर्ण आभूषणों से सजे स्वरूप को देखने के लिए देश-विदेश से लोग पहुंचेंगे।

Bhawna Choubey
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