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कैसे शुरू हुई गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा? क्या है इसके पीछे को असल कहानी जानिए

Written by:Ronak Namdev
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कहा जाता है कि गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने से चारधाम यात्रा जितना पुण्य फल मिलता है। श्रीकृष्ण से जुड़ी इस धार्मिक परंपरा में लोग नंगे पांव ही नहीं, बल्कि लेटकर भी 21 किलोमीटर का सफर तय करते हैं। जानिए इसकी शुरुआत कैसे हुई, इसका धार्मिक महत्व और क्यों इसे मोक्षदायक माना जाता है।
कैसे शुरू हुई गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा? क्या है इसके पीछे को असल कहानी जानिए

मथुरा जिले के गोवर्धन पर्वत को लेकर एक बेहद लोकप्रिय धार्मिक मान्यता है। श्रीकृष्ण ने जब इंद्र के घमंड को चूर कर ब्रजवासियों को भारी बारिश से बचाया, तभी उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाया था। इसके बाद ब्रजवासियों के साथ खुद श्रीकृष्ण ने इस पर्वत की परिक्रमा की, जो आज भी जारी है। इसे सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि श्रद्धा, आस्था और त्याग की प्रतीक यात्रा माना जाता है।

दरअसल गोवर्धन परिक्रमा की परंपरा हजारों साल पुरानी मानी जाती है। मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण ने देखा कि गांव वाले इंद्र की पूजा कर रहे हैं, तो उन्होंने इसका विरोध करते हुए कहा कि गोवर्धन पर्वत की पूजा होनी चाहिए क्योंकि इसी से हमारी गायों और खेती को जीवन मिलता है। कृष्ण की बात मानते हुए गांव वालों ने गोवर्धन की पूजा की, जिससे नाराज होकर इंद्र ने भयंकर बारिश शुरू कर दी।

कैसे होती है गोवर्धन परिक्रमा और क्या हैं इसके नियम

बता दें कि बारिश से ब्रज डूबने लगा तो कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाकर सभी को शरण दी। यह घटना इंद्र का अहंकार तोड़ने वाली थी और तभी से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा की परंपरा शुरू हुई। कहा जाता है कि इस परिक्रमा से चारधाम के बराबर पुण्य फल मिलता है और इससे हर तरह की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। गोवर्धन परिक्रमा का मार्ग लगभग 21 किलोमीटर लंबा होता है, जिसे पैदल तय करने में 4 से 5 घंटे का समय लगता है। कुछ भक्त इसे नंगे पांव करते हैं, तो कुछ दंडवत यानी लेटते हुए पूरी परिक्रमा करते हैं, जिसमें 5 से 7 दिन तक का समय लग सकता है। इसके अलावा छोटी परिक्रमा 9 किलोमीटर और बड़ी परिक्रमा 12 किलोमीटर की होती है।

परिक्रमा के दौरान भक्त ‘राधे-राधे’ या ‘गोवर्धन महाराज की जय’ कहते हुए आगे बढ़ते हैं। नियमों के अनुसार, परिक्रमा के दौरान किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए, केवल भगवान का नाम लेते रहना चाहिए। कुछ लोग यहां साल में एक बार पूरे परिवार के साथ आते हैं और गोवर्धन पूजा के दिन विशेष रूप से परिक्रमा करते हैं।

मथुरा का चारधाम से क्या है संबंध?

दरअसल मथुरा को अक्सर ‘ब्रजभूमि का दिल’ कहा जाता है, लेकिन यहां गोवर्धन परिक्रमा के कारण इसे ‘मथुरा का चारधाम’ भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त चारधाम की यात्रा नहीं कर पाते, वे गोवर्धन परिक्रमा कर वही पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। खास बात यह है कि यहां सिर्फ धर्म नहीं, बल्कि भावना भी जुड़ी है हर जाति, वर्ग और उम्र के लोग बिना किसी भेदभाव के परिक्रमा करते हैं। वर्तमान में ओल्ड एज पेंशन से लेकर फैमिली ट्रिप तक, हर तरह के भक्त यहां आते हैं। परिक्रमा मार्ग पर जगह-जगह भंडारे, पानी की व्यवस्था और विश्राम स्थल मिलते हैं। ये परिक्रमा सिर्फ एक धार्मिक कर्तव्य नहीं बल्कि जीवन को सकारात्मकता देने वाली एक यात्रा बन जाती है। इसीलिए इसे सिर्फ मथुरा नहीं, पूरे देश में खास महत्व दिया जाता है।

Disclaimer- यहां दी गई सूचना सामान्य जानकारी के आधार पर बताई गई है। इनके सत्य और सटीक होने का दावा MP Breaking News न्यूज़ नहीं करता।

Ronak Namdev
लेखक के बारे में
मैं रौनक नामदेव, एक लेखक जो अपनी कलम से विचारों को साकार करता है। मुझे लगता है कि शब्दों में वो जादू है जो समाज को बदल सकता है, और यही मेरा मकसद है - सही बात को सही ढंग से लोगों तक पहुँचाना। मैंने अपनी शिक्षा DCA, BCA और MCA मे पुर्ण की है, तो तकनीक मेरा आधार है और लेखन मेरा जुनून हैं । मेरे लिए हर कहानी, हर विचार एक मौका है दुनिया को कुछ नया देने का । View all posts by Ronak Namdev
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