यह सवाल लगभग हर इंसान के मन में कभी न कभी जरूर आया है कि आखिर ईश्वर ने इस विशाल संसार की रचना क्यों की। क्या भगवान को किसी चीज़ की कमी थी? या फिर यह संसार किसी मजबूरी में बनाया गया? इसी गहरे और सदियों पुराने प्रश्न को लेकर एक भक्त ने प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज से सीधा सवाल किया। प्रेमानंद महाराज, जो अपने सरल शब्दों और गहन आध्यात्मिक विचारों के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने इस जटिल विषय को इतने सहज तरीके से समझाया कि कठिन दर्शन भी आम इंसान की समझ में आ गया। उनके अनुसार, सृष्टि किसी आवश्यकता या स्वार्थ से नहीं, बल्कि ईश्वर की सहज लीला से उत्पन्न हुई है।
प्रेमानंद महाराज कौन हैं और क्यों सुनी जाती है उनकी बात
प्रेमानंद महाराज आज के समय के उन संतों में गिने जाते हैं, जिनके विचार आम लोगों के जीवन से सीधे जुड़ते हैं। वे बड़े-बड़े दार्शनिक शब्दों के बजाय रोज़मर्रा के उदाहरणों से गूढ़ सत्य समझाते हैं। यही कारण है कि युवा, बुजुर्ग और बच्चे हर वर्ग के लोग उनके प्रवचनों से जुड़ाव महसूस करते हैं। उनके सत्संगों में जीवन, ईश्वर, कर्म, माया और भक्ति जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा होती है। सृष्टि की रचना पर दिया गया उनका यह विचार भी इसी कड़ी का हिस्सा है, जो आज सोशल मीडिया और सत्संगों में खूब चर्चा में है।
एकोहं बहुस्याम सृष्टि रचना का मूल सूत्र
प्रेमानंद महाराज ने सृष्टि की उत्पत्ति को समझाने के लिए वेदों के प्रसिद्ध वाक्य एकोहं बहुस्याम का उल्लेख किया। इसका अर्थ है मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ।
महाराज के अनुसार, परमात्मा पूर्ण है, लेकिन जब उनमें खेलने का भाव जागृत हुआ, तो उन्होंने स्वयं को अनेक रूपों में प्रकट कर दिया। यही सृष्टि का आरंभ है। ईश्वर ने किसी बाहरी तत्व से नहीं, बल्कि स्वयं को ही जड़ और चेतन के रूप में विस्तार दिया।
खिलाड़ी, खिलौना और दर्शक स्वयं ईश्वर
प्रेमानंद महाराज ने ईश्वर की लीला को बेहद सरल उदाहरण से समझाया। उन्होंने कहा कि खेल कभी अकेले नहीं खेला जाता। खेलने के लिए खिलाड़ी, खिलौना और देखने वाला तीनों चाहिए। ईश्वर ने यह तीनों भूमिकाएं स्वयं निभाईं। वे स्वयं ही इस संसार के रचयिता हैं, स्वयं ही इसमें प्राणी रूप में खेल रहे हैं और स्वयं ही इस पूरे खेल के साक्षी हैं। यही कारण है कि सृष्टि में जो कुछ भी हो रहा है, वह ईश्वर की ही लीला है।
संसार का बनना और बिगड़ना
संसार के निर्माण और विनाश को लेकर प्रेमानंद महाराज ने एक बहुत ही सरल उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जैसे छोटे बच्चे मिट्टी से घर बनाते हैं और फिर खेल-खेल में उसे तोड़ भी देते हैं। ठीक उसी तरह, ईश्वर भी इस सृष्टि को रचते हैं, पालते हैं और समय आने पर स्वयं ही उसे समेट लेते हैं। यह कोई क्रूरता या गलती नहीं, बल्कि एक सहज, बालवत लीला है। इस पर तर्क करना या प्रश्न उठाना वैसा ही है जैसे बच्चे के खेल पर नाराज़ होना।
क्या ईश्वर को भी इच्छाएं होती हैं?
यह एक आम सवाल है कि अगर ईश्वर पूर्ण हैं, तो क्या उन्हें भी हमारी तरह इच्छाएं होती हैं? इस पर प्रेमानंद महाराज ने बहुत साफ शब्दों में उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि ईश्वर की इच्छाएं हमारी तरह व्यक्तिगत या स्वार्थी नहीं होतीं। जब सृष्टि का समय आता है, तब ईश्वर के भीतर स्थित योग निद्रा में सोई हुई माया या प्रकृति सक्रिय होती है। वही सृष्टि रचने की प्रक्रिया को आरंभ करती है।
माया क्या है और सृष्टि में उसकी भूमिका
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, माया ईश्वर की शक्ति है, जो सृष्टि को चलाती है। माया ही जीवों को संसार में बांधती है और माया के कारण ही हमें सुख-दुख, लाभ-हानि, जन्म-मृत्यु का अनुभव होता है। लेकिन यह माया भी ईश्वर के नियंत्रण में है। जब सृष्टि का समय समाप्त होता है, तो यही माया वापस ईश्वर में लीन हो जाती है। इस तरह सृष्टि का चक्र चलता रहता है।
बुद्धि की सीमा और परमात्मा की अनंतता
महाराज ने यह भी समझाया कि इंसान अपनी सीमित बुद्धि से ईश्वर को पूरी तरह नहीं समझ सकता। हमारी बुद्धि स्वयं प्रकृति का एक छोटा सा हिस्सा है।
जब इंसान तर्क करता-करता थक जाता है, तब उसे यह एहसास होता है कि बुद्धि की एक सीमा है। अनंत परमात्मा को सीमित बुद्धि में बांधा नहीं जा सकता।
समर्पण ही है ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, जब बुद्धि असफल हो जाती है, तब समर्पण का मार्ग खुलता है। ईश्वर को समझने के लिए ज्यादा तर्क नहीं, बल्कि श्रद्धा और स्मरण की जरूरत होती है। जब इंसान निरंतर परमात्मा का नाम स्मरण करता है, तो ईश्वर स्वयं उसकी बुद्धि में आकर बैठ जाते हैं। उसी को महाराज परमात्म बुद्धि कहते हैं। उसी बुद्धि से ईश्वर को जाना और पहचाना जा सकता है।





