मध्य प्रदेश के सागर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने हर किसी को झकझोर दिया है। बंडा तहसील के सिविल अस्पताल में इलाज के दौरान एक 1 साल 7 महीने के मासूम की आंखों की रोशनी चले जाने का आरोप लगाया गया है।
परिवार का कहना है कि इलाज के दौरान डॉक्टर द्वारा आई ड्रॉप की जगह नाक में डालने वाली दवा इस्तेमाल कर दी गई, जिसके बाद बच्चे की हालत बिगड़ती चली गई। बच्चा विनय विश्वकर्मा सर्दी और आंखों में लालिमा की शिकायत के बाद अस्पताल लाया गया था।
परिवार का आरोप है कि सही इलाज न मिलने और दवा में गलती के कारण मासूम की स्थिति लगातार खराब होती गई। इसके बाद बच्चे को पहले सागर जिला अस्पताल और फिर गंभीर हालत में भोपाल एम्स रेफर किया गया। एम्स में जांच के बाद डॉक्टरों ने बताया कि बच्चे की आंखों की रोशनी पूरी तरह खत्म हो चुकी है। इस खबर के बाद परिवार सदमे में है और लगातार अस्पतालों के चक्कर लगा रहा है।
इलाज में गलती या सिस्टम की बड़ी चूक?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ एक व्यक्तिगत गलती है या फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की बड़ी खामी? बच्चे के पिता इन्द्राज विश्वकर्मा का कहना है कि 29 मई को वे अपने बेटे को सामान्य समस्या के चलते बंडा सिविल अस्पताल लेकर पहुंचे थे। वहां ओपीडी में डॉक्टर ने दवाएं लिखीं और इलाज शुरू हुआ। लेकिन कुछ ही समय बाद बच्चे की हालत तेजी से बिगड़ने लगी।
बाद में बच्चे को सागर और फिर भोपाल एम्स रेफर किया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एम्स में डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि बच्चे की आंखों की रोशनी वापस आना अब संभव नहीं है। इस घटना ने अस्पताल की कार्यप्रणाली, दवा देने के तरीके और मेडिकल प्रोटोकॉल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
परिवार की शिकायत और जांच की मांग
घटना के बाद पीड़ित परिवार ने बंडा थाने में शिकायत दर्ज कराई है और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। परिवार का कहना है कि वे डॉक्टर को पहचानते हैं लेकिन नाम नहीं जानते, इसलिए पुलिस से निष्पक्ष जांच की अपील की गई है। वहीं स्थानीय नेताओं ने भी मामले को गंभीर बताते हुए जांच की मांग उठाई है। कांग्रेस नेता रणवीर सिंह दाऊ डिलाखेड़ी ने भी प्रशासन से मिलकर पूरी घटना की जांच और जिम्मेदारों पर कार्रवाई की बात कही है।
वहीं बंडा सिविल अस्पताल के अधिकारियों का कहना है कि बच्चे को पहले से ही आंखों में संक्रमण, कॉर्नियल अल्सरेशन और कुपोषण जैसी समस्याएं थीं, जिसके चलते उसे उच्च स्तरीय इलाज के लिए रेफर किया गया था। फिलहाल यह मामला जांच के दायरे में है और स्वास्थ्य विभाग से लेकर पुलिस प्रशासन तक सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। इस घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता और मरीज सुरक्षा को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।






