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सौरभ गांगुली के लिए भी सिरदर्द बन जाते थे ये दो दिग्गज भारतीय खिलाड़ी, नाम सुनकर आप भी चौंक जाएंगे

Written by:Rishabh Namdev
Published:
टीम इंडिया के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने खुद खुलासा किया है कि जब वे भारतीय टीम की कप्तानी कर रहे थे, तो दो खिलाड़ी ऐसे थे जो हर बार प्लेइंग इलेवन में जगह न मिलने पर उनसे लड़ पड़ते थे। ये कोई आम नाम नहीं बल्कि भारत के दिग्गज स्पिनर अनिल कुंबले और हरभजन सिंह थे, जो गांगुली के लिए सबसे बड़ा चैलेंज बन जाते थे।
सौरभ गांगुली के लिए भी सिरदर्द बन जाते थे ये दो दिग्गज भारतीय खिलाड़ी, नाम सुनकर आप भी चौंक जाएंगे

सौरव गांगुली ने हाल ही में एक इंटरव्यू में खुलासा किया कि कप्तानी के दौरान जब उन्हें टीम के हित में कोई सख्त फैसला लेना होता, तो ज्यादातर खिलाड़ी इसे समझ जाते थे। लेकिन दो खिलाड़ी ऐसे थे जो आसानी से मानते नहीं थे और इन दो खिलाड़ियों का नाम अनिल कुंबले और हरभजन सिंह था। दरअसल खासकर तब जब पिच की कंडीशन को देखते हुए उनमें से किसी एक को बाहर बैठाना पड़ता, तो मामला काफी गंभीर हो जाता था।

दरअसल भारत में या पडोसी देशों की स्पिन फ्रेंडली पिचों पर दोनों को मौका मिल जाता, लेकिन विदेशों में खासकर इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया या साउथ अफ्रीका जैसी जगहों पर जब हरी पिच मिलती, तो टीम को एक अतिरिक्त तेज गेंदबाज खिलाना होता था, जिससे कुंबले या हरभजन में से किसी एक को ड्रॉप करना पड़ता था।

दोनों खिलाड़ियों को बाहर करना आसान नहीं था

वहीं इस दौरान सौरभ गांगुली ने बताया कि जब वे किसी एक को आराम देने की सोचते थे, तो सबसे पहले वही खिलाड़ी सामने आकर सवाल करता था “मैं क्यों नहीं खेल रहा?” यह सवाल आसान नहीं होता था, क्योंकि दोनों ही दिग्गज खिलाड़ी अपने प्रदर्शन, आत्मसम्मान और देश के लिए खेलने के जुनून में कोई समझौता नहीं करना चाहते थे। सौरभ गांगुली ने कहा कि कप्तान के तौर पर उनके लिए ये सिचुएशन मानसिक रूप से थका देने वाली होती थी, लेकिन वे इस बात से भी खुश थे कि उनकी टीम में ऐसे खिलाड़ी हैं जो हर मैच को खेलने के लिए जुनूनी हैं।

जानिए आगे क्या बोले सौरभ गांगुली

दरससल हरभजन सिंह और अनिल कुंबले जैसे खिलाड़ी सिर्फ पिच की कंडीशन नहीं देखते थे, वो हर मैच में खुद को मैच विनर मानते थे, भले ही पिच स्पिन के अनुकूल हो या नहीं। उनका यही आत्मविश्वास और जिद्द टीम को भी आगे बढ़ाता था। वहीं सौरव गांगुली ने अपने इंटरव्यू में यह भी कहा कि एक कप्तान के लिए यह अच्छी बात होती है कि उसके पास ऐसे खिलाड़ी हों जो टीम से बाहर रहने पर सवाल करें। ये खिलाड़ी पांच दिन की छुट्टी लेकर चैन से बैठने वालों में से नहीं थे। उनका सिर्फ एक ही फोकस होता था मैच खेलना और जीत में योगदान देना।

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