सोशल मीडिया और मॉडलिंग की दुनिया से जुड़ी हर्षा रिछारिया ने संन्यास लेकर नया जीवन शुरू करने का फैसला किया है। दरअसल उज्जैन स्थित मौनी तीर्थ आश्रम में उन्होंने दीक्षा लेकर हर्षानंद गिरि नाम अपनाया है। हालांकि संन्यास के तुरंत बाद इस पूरे मामले पर विवाद खड़ा हो गया है। बता दें कि कई संतों ने संन्यास की प्रक्रिया को लेकर आपत्ति जताई है। बताया जा रहा है कि दीक्षा समारोह में स्वामी सुमनानंद गिरि ने उन्हें संन्यास की दीक्षा दी।
वहीं इसके बाद उनका नाम बदलकर हर्षानंद गिरि रखा गया है और उन्हें अखाड़े की परंपरा के अनुसार साध्वी के रूप में स्वीकार किया गया। लेकिन जैसे ही यह खबर सामने आई मध्य प्रदेश और अन्य जगहों के कुछ संतों ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
नियमों को लेकर उठा विवाद
दरअसल हर्षा रिछारिया के संन्यास को लेकर भोपाल में भी विरोध सामने आया है। मध्य प्रदेश संत समिति के अध्यक्ष अनिलानंद महाराज ने इस दीक्षा पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि संन्यास की प्रक्रिया में कई पारंपरिक नियमों का पालन जरूरी होता है और अगर इन नियमों को नजरअंदाज किया जाता है तो यह परंपरा के खिलाफ माना जाता है। वहीं कुछ संतों का दावा है कि संन्यास लेने से पहले कई धार्मिक विधियां पूरी करनी पड़ती हैं। इसमें पिंडदान, व्रत और कई अन्य प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। आम तौर पर इस दौरान साधक का मुंडन भी कराया जाता है और उसे सांसारिक जीवन से पूरी तरह अलग होने का संकल्प लेना पड़ता है।
वहीं विवाद इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि संन्यास के बाद भी हर्षा सामान्य युवतियों की तरह मेकअप और आभूषणों के साथ नजर आईं है। दरअसल लोगों का कहना है कि संन्यासी जीवन में सादगी और नियमों का पालन जरूरी होता है।
गुरु सुमनानंद गिरि का जवाब
वहीं इन सवालों के बीच दीक्षा देने वाले स्वामी सुमनानंद गिरि ने सफाई दी है। दरअसल उन्होंने कहा कि संन्यास देने से पहले उन्होंने हर्षा से कई बार नियमों के बारे में पूछा था और पूरी तरह सहमति मिलने के बाद ही दीक्षा दी गई। उनके अनुसार करीब 50 बार पुष्टि करने के बाद यह फैसला लिया गया है। वहीं मुंडन को लेकर उठे सवाल पर उन्होंने कहा कि हर्षा पहले ही एक बार मुंडन करवा चुकी थीं इसलिए दोबारा बाल काटना जरूरी नहीं समझा गया। उनके मुताबिक संन्यास की प्रक्रिया में कुछ फैसले गुरु के विवेक पर भी निर्भर करते हैं।
हालांकि इस दीक्षा में हर्षा के परिवार के सदस्य भी मौजूद थे। संन्यास के बाद उन्हें अखाड़े की परंपरा के अनुसार नया नाम दिया गया और अब उन्हें हर्षानंद गिरि के रूप में जाना जाएगा।






