उज्जैन में आयोजित इंटरनेशनल किन्नर अखाड़े की बैठक में चार नए महामंडलेश्वरों का पट्टाभिषेक किया गया। वहीं इनमें सबसे ज्यादा चर्चा 27 साल की कालीनंद गिरी दिगंबर अघोरी माता की हो रही है। उन्हें देश की सबसे कम उम्र में महामंडलेश्वर बनने वाली किन्नर संत बताया जा रहा है। दरअसल उनका अघोरी रूप, तंत्र साधना और अनोखी जीवनशैली लोगों का ध्यान अपनी और खींच रही है।

दरअसल कालीनंद गिरी अपने अलग अंदाज के कारण धार्मिक और सोशल मीडिया दोनों जगह चर्चा में हैं। वे अक्सर शरीर पर चिता की राख लगाकर काले वस्त्र पहनती हैं और नाक में बड़ी नथ के साथ खुली जटाओं में नजर आती हैं। यही वजह है कि उन्हें पहली किन्नर अघोरी के रूप में भी देखा जा रहा है।

बचपन में छोड़ा घर

बताया जाता है कि वे यात्रा के लिए एक खास कार का इस्तेमाल करती हैं, जिसमें करीब 70 नरमुंड रखे होने का दावा किया जाता है। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा है कि उन्हें करीब 18 भाषाओं का ज्ञान है, जो उन्होंने देश-विदेश की यात्राओं के दौरान सीखी हैं। दरअसल कालीनंद गिरी मूल रूप से तेलंगाना के मंचेरियल जिले की रहने वाली बताई जाती हैं। उन्होंने बताया कि बचपन में ही उन्होंने घर छोड़कर संन्यास का रास्ता चुन लिया था। उनका कहना है कि 6 साल की उम्र से ही उन्होंने तंत्र साधना सीखना शुरू कर दिया था। बाद में 12 साल की उम्र में वे काशी चली गईं, जहां एक संत के जरिए उनकी मुलाकात किन्नर अखाड़े की सती नंद गिरी माता से हुई।

करीब छह साल तक तंत्र साधना की शिक्षा ली

वहीं कालीनंद गिरी के अनुसार शुरुआती जीवन में उन्हें कई कठिन हालात का सामना करना पड़ा था। इन्हीं परिस्थितियों के चलते वे असम के प्रसिद्ध कामाख्या धाम पहुंचीं, जहां उन्हें अपने गुरु मिले। गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने करीब छह साल तक तंत्र साधना की शिक्षा ली। उन्होंने बताया कि धर्म और साधना से जुड़ाव बचपन से ही था, इसलिए उन्होंने पूरी तरह इसी रास्ते को अपना जीवन बना लिया। वहीं बाद में उनकी मुलाकात इंटरनेशनल किन्नर अखाड़े की आचार्य डॉ. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी से हुई। उनके मार्गदर्शन में कालीनंद गिरी अखाड़े से जुड़ीं और अब उन्हें महामंडलेश्वर की जिम्मेदारी दी गई है। धार्मिक विशेषज्ञों के मुताबिक, किन्नर अखाड़ा पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक परंपराओं में अपनी अलग पहचान बना रहा है। उज्जैन में 13 और 14 मार्च को किन्नर अखाड़े का दो दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसी कार्यक्रम में काली नंद गिरी का पट्टाभिषेक किया गया।