महाकाल की नगरी उज्जैन एक बार फिर दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक सिंहस्थ 2028 की तैयारियों को लेकर चर्चा में है। जैसे-जैसे यह आयोजन करीब आ रहा है, वैसे-वैसे संत समाज और विभिन्न अखाड़ों में बैठकों का दौर तेज होता जा रहा है। हाल ही में उज्जैन में किन्नर अखाड़े की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें देश के कई राज्यों से किन्नर समाज के साधु-संत और पदाधिकारी शामिल हुए।
इस बैठक में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी जी महाराज की मौजूदगी ने इसे और महत्वपूर्ण बना दिया। किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बताया कि सिंहस्थ 2028 को लेकर किन्नर अखाड़ा पूरी तरह सक्रिय हो चुका है और इस बार बड़ी संख्या में किन्नर संत उज्जैन पहुंचकर मां शिप्रा में आस्था की डुबकी लगाएंगे और साधना करेंगे।
सिंहस्थ 2028 को लेकर उज्जैन में तेज हुई हलचल
उज्जैन में होने वाला सिंहस्थ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आस्था, परंपरा और संस्कृति का बड़ा उत्सव है। हर 12 साल में होने वाला यह आयोजन लाखों नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। इसी वजह से सिंहस्थ 2028 की तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं।
किन्नर अखाड़े की बैठक को इसी तैयारी का अहम हिस्सा माना जा रहा है। बैठक में देशभर से आए किन्नर संतों ने सिंहस्थ के दौरान होने वाले धार्मिक कार्यक्रमों, शिप्रा स्नान और अखाड़े की भूमिका को लेकर विस्तार से चर्चा की।
किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बताया कि सिंहस्थ 2028 में किन्नर समाज की बड़ी और संगठित भागीदारी देखने को मिलेगी। उन्होंने कहा कि किन्नर समाज के संत उज्जैन आकर मां शिप्रा के पवित्र जल में स्नान, आचमन और तपस्या करेंगे।
किन्नर संतों का शिप्रा स्नान: आस्था और परंपरा का संगम
सिंहस्थ के दौरान शिप्रा नदी में स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दौरान पवित्र शिप्रा में स्नान करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और उसे आध्यात्मिक शांति मिलती है।
लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने कहा कि लंबे समय बाद किन्नर समाज के साधु-संत इस तरह संगठित रूप से शिप्रा स्नान में शामिल होंगे। यह पूरे किन्नर समाज के लिए गर्व का विषय है।
उन्होंने कहा कि किन्नर समाज का सनातन परंपरा से गहरा संबंध रहा है। धार्मिक ग्रंथों में भी किन्नरों का उल्लेख मिलता है। ऐसे में सिंहस्थ जैसे बड़े धार्मिक आयोजन में किन्नर अखाड़े की भागीदारी आध्यात्मिक परंपराओं को और मजबूत करती है। सिंहस्थ 2028 में किन्नर संतों की मौजूदगी से यह आयोजन और भी भव्य और विविधतापूर्ण बनेगा। इससे समाज में एकता और समरसता का संदेश भी जाएगा।
मुख्यमंत्री मोहन यादव की तैयारियों की सराहना
किन्नर अखाड़े की बैठक में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा सिंहस्थ 2028 को लेकर की जा रही तैयारियों की भी सराहना की गई। लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार सिंहस्थ को लेकर गंभीरता से काम कर रही है। उज्जैन में बुनियादी सुविधाओं, यातायात व्यवस्था और श्रद्धालुओं के लिए जरूरी व्यवस्थाओं पर तेजी से काम किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि सरकार की इन तैयारियों से साधु-संत समाज में संतोष का माहौल है। जब प्रशासन और संत समाज मिलकर काम करते हैं तो ऐसे बड़े धार्मिक आयोजन सफल और व्यवस्थित तरीके से संपन्न होते हैं।
किन्नर समाज को लेकर फैलाई जा रही भ्रांतियों पर प्रतिक्रिया
बैठक के दौरान किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने किन्नर समाज को लेकर फैलाई जा रही कुछ भ्रांतियों पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि कई बार किन्नर समाज के बारे में गलत बातें फैलाई जाती हैं, जो पूरी तरह निराधार हैं। किन्नर समाज भी उसी तरह विविधता से भरा हुआ है जैसे सामान्य समाज में अलग-अलग धर्म और परंपराएं होती हैं।
उन्होंने कहा कि किन्नर समाज हमेशा से सनातन परंपरा और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ा रहा है। ऐसे में किन्नर अखाड़े को लेकर लगाए जा रहे आरोप सही नहीं हैं। लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने यह भी कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो ऐसे मामलों में किन्नर समाज कानून और सरकार का सहारा लेने से भी पीछे नहीं हटेगा।
किन्नर अखाड़े में बने दो नए महामंडलेश्वर
उज्जैन में हुई इस बैठक के दौरान किन्नर अखाड़े में संगठन को मजबूत करने के लिए एक अहम फैसला भी लिया गया। बैठक में दो नए महामंडलेश्वर बनाए गए। इसका उद्देश्य किन्नर अखाड़े की संरचना को और मजबूत करना है ताकि सिंहस्थ 2028 जैसे बड़े आयोजन में अखाड़ा बेहतर तरीके से अपनी भूमिका निभा सके। किन्नर संतों का मानना है कि मजबूत संगठन के साथ ही धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया जा सकता है।
सिंहस्थ 2028 में किन्नर अखाड़े की भूमिका क्यों अहम
सिंहस्थ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का बड़ा उत्सव है। इस आयोजन में अलग-अलग अखाड़ों और संत समाज की भागीदारी इसे खास बनाती है। किन्नर अखाड़े की मौजूदगी यह संदेश देती है कि सनातन संस्कृति में हर वर्ग का सम्मान और स्थान है।
सिंहस्थ 2028 में किन्नर संतों की भागीदारी समाज में समरसता और समानता का संदेश देगी। यह दिखाता है कि भारतीय संस्कृति विविधता को स्वीकार करती है और सभी को साथ लेकर चलती है।






