महाकाल मंदिर में आज रंगों की धूम! संध्या आरती के बाद जलेगी होलिका

उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकाल मंदिर में आज संध्या आरती के बाद होलिका दहन होगा। भस्म आरती में भगवान महाकाल हर्बल गुलाल से होली खेलेंगे, लेकिन मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के रंग खेलने पर रहेगा सख्त प्रतिबंध।
Mahakal Holi

होली का त्योहार आते ही उज्जैन की गलियों में अलग ही उत्साह दिखाई देने लगता है। लेकिन सबसे खास नजारा होता है महाकाल मंदिर का। यहां होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि भक्ति और परंपरा का अनोखा संगम है।

आज शाम संध्या आरती के बाद महाकाल मंदिर में विधि-विधान से होलिका दहन होगा। इसके बाद तड़के चार बजे होने वाली प्रसिद्ध भस्म आरती में रंगोत्सव मनाया जाएगा। भगवान महाकाल को हर्बल गुलाल अर्पित कर होली खेली जाएगी।

संध्या आरती के बाद होगा महाकाल मंदिर में होलिका दहन

महाकाल मंदिर में होली की शुरुआत संध्या आरती से होगी। इस दौरान भगवान महाकाल को शक्कर से बनी विशेष माला पहनाई जाएगी। आरती के समय पुजारी भगवान को गुलाल अर्पित करेंगे।

आरती समाप्त होने के बाद मंदिर परिसर में ओंकारेश्वर मंदिर के सामने बनाई गई होलिका का पूजन होगा। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ होलिका दहन किया जाएगा। महाकाल मंदिर में होलिका दहन हर साल श्रद्धा और अनुशासन के साथ संपन्न होता है। हजारों श्रद्धालु इस पवित्र क्षण के साक्षी बनते हैं।

भस्म आरती में मनाया जाएगा रंगोत्सव

तीन मार्च की सुबह तड़के चार बजे होने वाली भस्म आरती खास होगी। इस दौरान भगवान महाकाल को एक किलो हर्बल गुलाल अर्पित किया जाएगा। मंदिर की परंपरा के अनुसार धुलेंडी के दिन होने वाली सभी पांच आरतियों में भगवान को गुलाल चढ़ाया जाएगा। महाकाल मंदिर में होली उत्सव का यह दृश्य बेहद आध्यात्मिक होता है। यहां रंगों का प्रयोग सीमित और शुद्ध तरीके से किया जाता है। हर्बल गुलाल का उपयोग पर्यावरण और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किया जाता है।

मंदिर में रंग खेलने पर सख्त प्रतिबंध

हालांकि भगवान महाकाल के साथ प्रतीकात्मक रूप से होली खेली जाती है, लेकिन मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं को रंग खेलने की अनुमति नहीं है। मंदिर प्रशासन ने साफ निर्देश दिए हैं कि कोई भी व्यक्ति रंग, गुलाल या पिचकारी लेकर प्रवेश नहीं कर सकेगा। सभी प्रवेश द्वारों पर सख्त जांच की जाएगी। महाकाल मंदिर में होली के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और भी कड़ी कर दी जाती है। पुजारी, पुरोहित, सेवक और भक्त सभी के लिए नियम समान हैं।

सिंहपुरी में पांच हजार कंडों की हर्बल होली

उज्जैन के पुराने शहर सिंहपुरी में भी होली का खास आयोजन होता है। यहां गाय के गोबर से बने करीब पांच हजार कंडों से होली तैयार की जाती है। बताया जाता है कि यह परंपरा लगभग दो हजार साल पुरानी है। खास बात यह है कि इसमें लकड़ी का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता। होलिका के मध्य में प्रह्लाद के प्रतीक के रूप में केसरिया ध्वज लगाया जाता है। चार वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण वैदिक मंत्रों के साथ पूजन करते हैं। शहर में लगभग 250 स्थानों पर होलिका सजाई जाती है, लेकिन सिंहपुरी की हर्बल होली विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है।

Bhawna Choubey
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